तीन ठेलियों का हिसाब, और हवा में छूट गई गिनती
लाइब्रेरी बंद हो चुकी थी। मैं लौटाई हुई किताबें तीन ठेलियों में बाँट रहा था: मुख्य शेल्फ, नीचे का भंडार, और दरवाज़े के पास अदला-बदली वाली मेज़। गिनती की तो कुछ किताबें कम निकलीं, बस किसी ठेली में दर्ज नहीं हुईं।
दुनिया का कार्बन का हिसाब भी ऐसा ही है। लोग कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, जैसे किताबें आती हैं। फिर वह हवा में, समुद्र में, और ज़मीन के पेड़-पौधों व मिट्टी में बँटती है। सीख ये कि हर ठेली की गिनती अलग रखो, तभी पकड़ में आता है क्या छूटा।
दिक्कत ये कि हर काउंटर की अपनी कॉपी है। ईंधन और कारखानों का हिसाब अलग, जंगल कटने या उगने का अलग, और हवा का अलग। ज़्यादातर दिन जोड़-घटाव लगभग मिल जाता है, पर थोड़ा सा फर्क रह जाता है। वही बचा हुआ ढेर बताता है कि कहीं कुछ बहाव छूट रहा है, खासकर साल-दर-साल।
फिर रजिस्टर में नए पन्ने जुड़े। दो हज़ार उन्नीस तक का पूरा हिसाब, और दो हज़ार बीस का जल्दी वाला अंदाज़ा, जब कोविड-19 में आवाजाही धीमी पड़ी। नियम भी कसे गए ताकि हर साल की गिनती एक जैसी बने। और ज़मीन वाले हिस्से में अब सिर्फ आखिरी जोड़ नहीं, अलग लिखा जाने लगा कि कितना कटा और कितना वापस उगा।
ये बदलाव चौंकाता है, क्योंकि शांत दिखने वाला कुल जोड़ अंदर की उथल-पुथल छुपा सकता है। जैसे ठेली में किताबें आईं भी और गईं भी, पर अंत में संख्या वही लगे। एक और बात, जंगल काटने से आगे की सोखने की जगह भी घटती है, जैसे भंडार का एक कमरा ही तोड़ देना।
फिर एक छोटी सुधार वाली बात निकली। सीमेंट समय के साथ थोड़ी कार्बन डाइऑक्साइड वापस पकड़ लेता है, तो ईंधन और उद्योग वाली गिनती में उसे भी जोड़ा गया। मेरे हिसाब में ये वैसा था जैसे कुछ किताबों के कवर नमी सोख लेते हों, और मेज़ पर फैला दाग उतना बड़ा न निकले जितना कल लगा था।
बंद के दिनों में डिलिवरी कम हुई, फिर भी ठेलियों का कुल ढेर बढ़ता रहा। तब फर्क साफ दिखता है: एक साल की सुस्ती से रोज़ का हिसाब बदलता है, पर जब तक ठेलियों में आने वाली किताबें लगातार कम न हों, जमा बढ़ता ही जाता है। और कुछ ठेलियाँ अब भी ऐसी हैं जिनकी गिनती हर बार एक जैसी नहीं बैठती।