ट्रेन संचालन कक्ष की एक डायरी, और सबका एक ही क्रम
स्टेशन के संचालन कक्ष में घंटी बज रही थी। मेज पर एक मोटी डायरी थी, और पाली प्रभारी हर घटना उसी में लिखता, फिर बोलकर सबको वही क्रम समझाता। यह डायरी वैसी है जैसे कई कंप्यूटरों की साझा सूची, एक ही कतार, ताकि हर जगह काम एक ही क्रम में चले।
फिर रेडियो में शोर भर गया, और प्रभारी की आवाज़ टूटने लगी। दो कर्मचारी अपनी अपनी डायरी खोलकर निर्देश देने लगे। किसी प्लेटफॉर्म पर एक आदेश माना गया, किसी पर दूसरा, और गाड़ियाँ गलत ताल में फँसने लगीं, जैसे कंप्यूटरों में संदेश देर से आएँ या खो जाएँ।
नया नियम आया कि प्रभारी की छोटी सी नियमित पुकार अगर कुछ देर न सुनाई दे, तो कोई भी तुरंत कुर्सी नहीं पकड़ेगा। हर कर्मचारी अलग अलग, थोड़ा अनिश्चित इंतजार करेगा, फिर ही आगे बढ़ेगा। इससे एक साथ दो प्रभारी बनने की टक्कर कम होती है, और सबको एक आवाज़ जल्दी मिल जाती है।
जो कुर्सी संभालता, वह बस अगला आदेश नहीं चिल्लाता। वह डायरी में आखिरी पक्का निशान दिखाकर पूछता कि सबकी कॉपी ठीक उसी जगह तक मिलती है या नहीं। जहाँ पन्ना अलग निकले, वहाँ से आगे काटकर वही लिखा जाता जो प्रभारी की डायरी में है, एक जगह मिलते ही पीछे का हिस्सा अपने आप मेल खा जाता है।
किसी पुराने, अधूरी डायरी वाले को कुर्सी न मिले, इसके लिए वोट का नियम सख्त रखा गया। कर्मचारी तभी हामी देते जब सामने वाले की डायरी में कम से कम उतनी ही ताज़ा लिखावट हो जितनी उनकी कॉपी में दिख रही हो। इससे पहले से तय घटनाएँ पीछे नहीं जातीं।
बीच में नई पाली जोड़नी थी और थकी पाली हटानी थी, तो बदलाव डायरी में दो कदम में लिखा गया। कुछ समय तक पुरानी और नई, दोनों तरफ की हामी के बिना कुछ पक्का नहीं माना गया। नए लोग पहले पास बैठकर लिखना पकड़ते रहे, फिर धीरे से पूरी जिम्मेदारी उनके हाथ आई।
रात तक डायरी भारी हो गई, तो प्रभारी ने एक साफ सार पन्ना बनाया, अभी की हालत और आखिरी पक्का निशान, और बहुत पुराने पन्ने अलग कर दिए। जो कर्मचारी पीछे रह गया था, उसे शुरुआत से सब नहीं सुनना पड़ा, बस सार से काम चल गया। फर्क बस इतना था, पहले हर कोई अपनी बात चलाता था, अब एक कुर्सी, मिलान का आसान तरीका, और बदलने के नियम मिलकर एक ही क्रम बचाते रहे।