डिपो में पार्सलों का नक्शा, और दिमाग का एक साफ रास्ता
डिपो के गेट पर ड्राइवर रुका। सामने पार्सलों का एक बड़ा ढेर, और इंतजार में साइकिल, छोटी वैन, बड़ा ट्रक। ड्राइवर के दिमाग में वही उलझन थी, जैसी बड़े काम को मशीनों से करवाने में होती है: काम को टुकड़ों में बाँटो, क्रम पकड़ो, और सही साधन तक पहुँचाओ।
पुराने ढंग में ड्राइवर कभी सब कुछ एक ही गाड़ी पर चढ़ा देता, कभी वही पर्ची बार बार देखता, और कभी भूल जाता कि कुछ पार्सल पहले जाँच के बिना जा ही नहीं सकते। नतीजा साफ था: समय जाता, चीजें दो बार इधर उधर होतीं, और छोटी गलती बड़ी गड़बड़ बन जाती।
फिर ड्राइवर ने एक साफ नक्शा बनाया। हर ठिकाने पर एक काम लिखा: तौलना, पर्ची लगाना, स्कैन करना, चढ़ाना। तीर दिखाते थे कि आगे क्या जाएगा: पार्सल या पर्चियों का गट्ठर। डिपो की अलमारी में एक बंद शेल्फ भी तय हुआ, ताकि गिनती और पर्चियाँ अगली बार फिर से शून्य से न शुरू हों।
कुछ काम ऐसे थे जो दिखने में अलग लगते, फिर भी पहले करने पड़ते। जैसे सुरक्षा जाँच बिना पार्सल चढ़ ही नहीं सकता, चाहे जगह खाली हो। ड्राइवर ने नियम जोड़ दिया: यह पहले, वह बाद में। यही नियम डिपो को टकराव से बचाता, और मशीनों वाले काम में कदम एक दूसरे पर चढ़ने से रोकता।
अब बँटवारा समझदारी से हुआ। भारी सामान ट्रक पर, पास की तेज डिलीवरी साइकिल पर, बीच का बोझ वैन पर। ड्राइवर ने देखा कि एक ही सूची की नकल हर जगह भेजना फिजूल है, तो एक जगह पर देकर वहीं से बाँटने लगा। इससे रास्ते में बोझ कम हुआ और गड़बड़ी भी।
दोपहर में एक ग्राहक ने सिर्फ एक पार्सल का हाल पूछा। ड्राइवर ने पूरा रूट नहीं चलाया, बस उतने ठिकाने देखे जितने जवाब के लिए जरूरी थे। और जहाँ देरी होती, ड्राइवर वहाँ की छोटी नोटिंग रखता, ताकि अगली बार भीड़ कम लगे और काम फँसे नहीं।
फिर वैन ने धोखा दे दिया, स्टार्ट ही नहीं हुई। ड्राइवर ने काम रोक दिया, अलमारी वाले बंद शेल्फ से आखिरी सही गिनती निकाली, और बाकी गाड़ियों से फिर से चल पड़ा। अब दिन याददाश्त और अंदाजे पर नहीं टिका था, एक नक्शे पर टिका था जो काम बाँटता, क्रम पकड़े रखता, और रुकावट के बाद भी काम को खड़ा कर देता।