जूते के डिब्बे वाली यादें, और मशीन का खेल सीखना
गेम वाले कमरे में किशोर के हाथ कंट्रोल पर थे। स्क्रीन झपकती, दुश्मन आते और गायब हो जाते, और हर दौर धुंध बन जाता। किशोर हर दौर के बाद छोटे कार्ड पर लिखकर जूते के डिब्बे में डाल देता, फिर बाद में डिब्बे से बेतरतीब कार्ड निकालकर वही चालें दोहराता।
मशीन के साथ भी यही मुश्किल थी। मशीन को सीधे स्क्रीन की तस्वीरों से सीखना था, बिना किसी इंसान के इशारों के। अगर मशीन बस अभी-अभी वाले पल से सीखती, तो वो उसी आखिरी उलझे दौर में फँस जाती और गलत चीजों के पीछे भाग सकती थी।
नया तरीका ये था कि मशीन ने जानबूझकर अपना जूते का डिब्बा बनाया। मशीन हर पल का छोटा रिकॉर्ड जमा करती, स्क्रीन कैसी थी, कौन सा कदम उठाया, अच्छा या बुरा क्या मिला, और अगली स्क्रीन कैसी बनी। फिर मशीन हर बार डिब्बे से बेतरतीब रिकॉर्ड लेकर सीखती, ताकि लगातार मिलते-जुलते पलों की पकड़ ढीली पड़े। बात साफ है, मिली-जुली यादें अभ्यास को टिकाती हैं।
मशीन को चाल समझने के लिए एक तस्वीर काफी नहीं थी। मशीन पिछली कुछ स्क्रीनें साथ रखती, जैसे किशोर ताज़ा कुछ कार्ड सामने रखकर दिशा और रफ्तार याद रखता है। तस्वीरों को हल्का किया गया, रंग घटाए, छोटा काटा, ताकि मशीन जल्दी देख सके और हर खेल में वही देखने वाला हिस्सा काम कर सके।
सीख को संभालने के लिए मशीन ने दो आदतें और पकड़ीं। जीत-हार को बस बुरा, फीका, या अच्छा जैसा छोटा निशान बना दिया, ताकि एक खेल के बड़े अंक दूसरे खेल को न दबाएँ। और मशीन कभी-कभी जानबूझकर अलग कदम भी उठाती, जैसे किशोर कभी नया बटन दबाकर देख लेता है, फिर धीरे-धीरे ये कम करता है पर छोड़ता नहीं।
कई अलग खेलों में यही तरीका चलाया गया, और मशीन ने पुराने तरीकों को पीछे छोड़ा जिन्हें इंसान से बताना पड़ता था कि स्क्रीन में क्या जरूरी है। हर खेल में मशीन सबसे बेहतर नहीं बनी, पर सीखना बिखरकर गिरना बंद हो गया। किशोर ने डिब्बे से निकले उलटे-सीधे कार्ड देखे और समझ गया, आखिरी गलती नहीं, मिली-जुली यादें हाथ को स्थिर करती हैं।