स्कैनर का इशारा: भरोसा बढ़ाए या गलती छुपाए?
हवाईअड्डे की ट्रेनिंग कक्षा में मैंने पासपोर्ट मशीन के नीचे सरकाया। ट्रेनर को पता था, ये असली है, पर मशीन का फैसला छुपा था। स्क्रीन पर बस इशारा मिला, या रंगों की परत, या एक छोटी सूची कि किस जवाब पर उसे कितना भरोसा है।
मैंने सोचा, जो इशारा साफ दिखे, उसी पर भरोसा कर लूं। बात ये है कि अच्छा लगना और सही फैसला करना अलग चीजें हैं। चमकदार इशारा कभी कभी गलत वक्त पर भी भरोसा करा देता है। इसलिए टीम को राय से अलग, नापने का तरीका चाहिए था।
खेल का नियम बदला। हर बार तस्वीर, सही जवाब, और मशीन के छुपे अंदाजे से जुड़ा एक इशारा दिखता। मेरा एक ही सवाल होता, क्या मशीन सही निकली होगी। फिर मेरा जवाब सही या गलत गिना जा सकता था, जैसे जज की सीटी।
फिर ये सब ऑनलाइन लोगों से कराया गया। इशारों के कई ढंग थे, ज़्यादातर वही रंगों वाली परत जो तस्वीर पर चढ़ती है। एक ढंग बिना रंग के था, बस सूची कि मशीन किस किस जवाब को ज्यादा या कम मान रही है, वादा नहीं, बस तुलना।
अक्सर वही सूची लोगों को सबसे ठीक फैसले तक ले गई, मशीन सही है या नहीं। कुछ रंगीन परतें मशीन के सही होने पर भरोसा बढ़ाती थीं, लेकिन वही परतें उसकी गलतियां पकड़ने में हाथ रोक देती थीं। एक परत उलटी निकली, शक तो बढ़ा, पर सही जगह भरोसा घट गया।
ट्रेनर ने एक और बात कही, ये सिर्फ समझाने वाला खतरा है। मशीन कभी सही ठप्पा गलत वजह से भी लगा सकती है, जैसे असली पासपोर्ट पर किसी आसानी से नकल होने वाली मुहर को पकड़ लेना। तब ईमानदार इशारा देखकर मैं कह दूं, मशीन गलत है, जबकि जवाब संयोग से सही था।
कक्षा में फर्क साफ था। पहले मैं पूछता था, इशारा अच्छा लगा या नहीं। अब सवाल बदल गया, इस इशारे से मैं सही वक्त पर भरोसा कर पा रहा हूं या नहीं। कभी सूची काम आती है, कभी रंग, और लक्ष्य के हिसाब से इशारा चुनना पड़ता है।