रात की ट्रेन में उल्टा पढ़ने से अनुवाद कैसे सुधर गया
रात की ट्रेन के डाक डिब्बे में पीली बत्ती झपक रही थी। मेरे हाथ में स्टेशन नोटों की लंबी पट्टी थी, एक ही भाषा में। हर प्लेटफॉर्म पर रुकना कम, तो मैंने पट्टी एक बार पढ़ी और मतलब एक छोटी जेब-कार्ड पर समेट दिया।
मुसीबत समय की थी। लिखने वाले को पहली पंक्ति के लिए कभी-कभी वो बात चाहिए होती जो पट्टी के आखिर में छुपी रहती। तब सुधार देर से आता और वही गलती फिर हो जाती। पहले लोग ढेर सारे बने-बनाए वाक्य और नियम जोड़ते थे, पर वो भारी और नाज़ुक पड़ते थे।
फिर नया तरीका आया। दो लोग, पर एक ही टीम की तरह सीखते हुए। पहला पूरा वाक्य पढ़कर एक तय आकार का सार जेब-कार्ड में बनाता। दूसरा उसी कार्ड को देखकर नया वाक्य शब्द-दर-शब्द लिखता, जो अभी लिखा और कार्ड में जो है, दोनों से अगला शब्द चुनता।
हमने देखा, गहराई मदद करती है। जैसे जेब-कार्ड सीधे लेखक को देने के बजाय बीच में कुछ क्लर्क हों, और हर क्लर्क उसी कार्ड को थोड़ा और साफ करके आगे बढ़ाए। ऐसी कई परतों के बाद कार्ड भी भरोसेमंद लगा, और शब्द चुनना भी कम भटका।
फिर एक अजीब-सा दांव चला। मैंने पट्टी को उल्टा कर दिया और आखिर से पढ़ना शुरू किया, लेकिन लेखक ने लिखना हमेशा की तरह शुरुआत से ही रखा। अटपटा लगा, पर फायदा दिखा: जो बात शुरुआत में लिखनी थी, वो पढ़ते वक्त अब ज़्यादा ताज़ा रहती थी।
जब ऐसे बहुत सारे वाक्यों पर यह टीम चली, तो अनुवाद पुराने नियम-और-वाक्य वाले तरीके से बेहतर निकलने लगा। पुराने तरीके के कुछ विकल्प हों, तो यह टीम उन्हें अंक देकर दूसरी राय भी दे देती थी। कोई अनजान शब्द आए, तो उसे "UNKNOWN" की मुहर जैसा मानकर बाकी रास्ता फिर भी ठीक से बन जाता था।
सुबह होने लगी तो फर्क साफ था। पहले हम सोचते थे कि बेहतर अनुवाद के लिए और नियम जोड़ने पड़ेंगे। अब ट्रेन के डिब्बे में वही काम एक छोटे, सीखे हुए जेब-कार्ड से चल रहा था, और उल्टा पढ़ने से सीखना आसान हो गया था।