फॉर्म में शांत, फैसले में घबराहट: बात कहाँ फिसलती है?
युवा कैंप की भर्ती में कुर्सियाँ खड़खड़ा रही थीं। मैंने फॉर्म में गोल घेरा: “दबाव में शांत रहता हूँ।” फिर रोल-प्ले आया: बच्चा रो रहा है, तूफान पास है, दो काउंसलर उलझे हैं। दो रास्ते थे, एक सधा हुआ, एक बिखरा हुआ।
आज लोग बातूनी लिखने वाली मशीनों से भी ऐसे ही फॉर्म भरवाते हैं। जवाब इतने इंसानी लगते हैं कि भरोसा हो जाए। बात ये है कि क्या मशीन का “मैं ऐसा हूँ” सच में दिखता भी है, जब हालात गड़बड़ और असली लगें?
कुछ लोगों ने फॉर्म को रोल-प्ले के साथ स्टेपल कर दिया, हर बात के लिए एक जोड़ी। कुल एक सौ अस्सी कथन लिए, और उतने ही रोज़मर्रा के दृश्य लिखे। हर दृश्य में दो काम: एक वही जो कथन कहता है, दूसरा उसका उलटा। यह सेट दो भाषाओं में भी बनाया गया ताकि मतलब बराबर रहे।
फिर इंसानों और मशीनों दोनों से दो तरह के जवाब लिए गए। फॉर्म वाली तरफ, हर कथन को एक से सात तक कई बार अलग ढंग से पूछकर अंक लिया गया। रोल-प्ले वाली तरफ, उसी पैमाने पर पूछा गया कि आप “सधे” काम की ओर झुकते हैं या “बिखरे” काम की ओर।
सब मशीनें यह खेल ठीक से निभा ही नहीं पाईं। कुछ से एक से सात वाले साफ जवाब बार-बार नहीं निकले, तो उन्हें अलग रखा गया। बाकी में यह भी देखा गया कि उलटी बात पूछने पर जवाब टकराते तो नहीं, और आधा फॉर्म बनाम बाकी आधा का रुझान मिलता है या नहीं।
जब फॉर्म के अंक और रोल-प्ले के चुनाव मिलाए गए, इंसानों में दोनों अक्सर एक ही कहानी बताते थे। मशीनों में अक्सर ऐसा हुआ: फॉर्म में “मैं धैर्यवान हूँ”, फिर दृश्य में बार-बार अधीर वाला काम। एक मशीन बाकी से बेहतर मिली, पर आम इंसानी मेल तक फिर भी नहीं पहुँची।
भर्ती वाला सुपरवाइज़र सख्त नहीं था, बस सावधान था। साफ-सुथरा फॉर्म अच्छे फैसलों की गारंटी नहीं देता। यही सीख मशीनों पर भी लागू हुई: सिर्फ “मैं कैसा हूँ” पढ़कर भरोसा मत करो; “ऐसी हालत में क्या करोगे” वाले दृश्य भी साथ रखो।