लिफ्ट का झटका और दिमाग की छोटी सी तरकीब
लिफ्ट के दरवाज़े खुले और लोग एक साथ घुस आए। सूचक ऊपर नीचे उछला, फिर लिफ्ट अटकती सी लगी। मैनेजर बोला, “मोटर ठीक है, गड़बड़ उस हिस्से में है जो भार समझकर खींचने का जोर तय करता है।”
मैनेजर ने कहा, “ये सेंसर हर पल ‘सामान्य भार’ का अंदाज़ा बदल रहा है, इसलिए लिफ्ट जरूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दे रही है।” दिमाग जैसी मशीनों में भी ऐसा होता है, जब अंदर का एक हिस्सा अपना काम बदल दे, तो अगले हिस्से को नए संकेत झेलने पड़ते हैं।
मैनेजर ने बीच में एक छोटा जोड़ लगा दिया। हर सफर की शुरुआत में वह सेंसर को उसी वक्त लिफ्ट में मौजूद लोगों के हिसाब से जल्दी से संतुलित कर देता, ताकि पढ़ाई एक तय दायरे में रहे। यही तरकीब दिमाग जैसी मशीन के बीच में भी लगती है, ताकि अगले हिस्से को संकेत “भागते हुए” न मिलें।
फिर उसने दो छोटे घुंडी भी रखे। संतुलन के बाद एक घुंडी से पढ़ाई को थोड़ा फैलाया जा सकता था, दूसरी से थोड़ा खिसकाया जा सकता था। मतलब लिफ्ट शांत भी रहे, और इमारत की जरूरत के हिसाब से उसे “सामान्य” का मतलब बदलने की आज़ादी भी मिले।
रोज़मर्रा में हर सफर में लिफ्ट उसी वक्त के लोगों से अपना संतुलन बनाती, तो हर बार थोड़ा फर्क आ ही जाता। वह हल्का सा फर्क कई बार मदद करता, जैसे शरीर को हल्की कसरत से आदत पक्की होती है। बाद में जब अकेला कोई सवारी आए, तो लिफ्ट जमा की हुई “आम” आदत पर चलती, ताकि पास में कौन है उससे चाल न बदले।
सेंसर स्थिर हुआ तो मैनेजर ने लिफ्ट को तेज़ प्रतिक्रिया देने लायक कर दिया, और झटका नहीं लगा। दिमाग जैसी मशीन में भी फायदा यही है, जब संकेत एक जैसे दायरे में रहें तो आगे के हिस्सों को बार बार नया तालमेल नहीं बिठाना पड़ता, काम ज्यादा सहज चलता है।
हफ्ते के आखिर में लिफ्ट सबसे अच्छी तरह तब लगी जब वह उबाऊ थी। भीड़ बदले, फिर भी चलना चिकना रहा। फर्क मोटर का नहीं था, बीच में लगे उस सीखने वाले संतुलन वाले जोड़ का था, जो पहले स्थिर करता और फिर जरूरत भर ढील देता।