आईने जैसी दरार ने रोशनी को चार रास्ते दे दिए
मेज पर रखी दो कंघियों जैसी पट्टियों के बीच एक महीन चीरा था। उसमें घूमती टिकिया छोड़ी गई तो उसका घुमाव तय करता था कि वह दाहिने सटेगी या बाएं, और हर ओर ऊपर या नीचे की धार पकड़ सकती थी। एक चीरा, चार पटरियां।
रोशनी वाली चिप पर यही बात पहले आसान नहीं थी। उसे सही पटरी पर चढ़ाने के लिए अलग मोड़ने वाले हिस्से और अलग बताने वाले हिस्से लगाने पड़ते थे। यहां मुश्किल रोशनी की वही किस्म थी जो सतह से चिपककर चलती है, खुली हवा में नहीं फैलती।
नई चाल यह थी कि चीरा खुद शुरुआत करे। दोनों ओर की बनावट आईने जैसी उलटी रखी गई। सीधी आई रोशनी दोनों तरफ बंट गई, लेकिन बाएं घूमती रोशनी सिर्फ दाहिने हिस्से से मेल खाई, और दाहिने घूमती रोशनी सिर्फ बाएं से। टिकिया और रोशनी, दोनों में रास्ता घुमाव चुनता है।
बात सिर्फ इतना नहीं थी कि कौन सा हिस्सा चुना गया। असली पकड़ उस घुमाव की थी जो आगे बढ़ती चाल के साथ या उसके उलट बैठता है। टिकिया में भी ऊपर दिखता चेहरा नहीं, किनारे का घूमना और लुढ़कना साथ कैसे पड़ते हैं, वही तय करता है कि वह किस धार से चिपकी रहेगी।
आखिर में छोटे चांदी के खंभों की कतारें कंघी के दांतों जैसी काम आईं। उन्होंने सतह से चिपकी रोशनी को चुने हुए मुहानों से बाहर फेंका। एक बनावट ने घुमाव बहुत साफ रखा, दूसरी छोटी बनावट ने बाहर निकलती रोशनी को ज्यादा मजबूत किया।
जब यह सब कांच पर चढ़ी चांदी की पतली परत में काटा गया, रास्ते सचमुच वैसे ही निकले। सीधी रोशनी दोनों ओर गई। बाएं और दाहिने घूमती रोशनी अलग मुहानों पर पहुंची, और बाहर निकलते समय उनका घुमाव भी उलटी जोड़ी में दिखा। पहले धक्का देकर मोड़ना पड़ता था, यहां आईना-जैसी दरार खुद पढ़ती भी है, भेजती भी।