नहर की लहरें जो पुरानी बात लौटाकर मारती हैं
सूरज निकलते ही मैं पतली नहर में नाव खे रहा था। एक जोरदार चप्पू पड़ा, लहरें दोनों किनारों से टकराईं, और थोड़ी देर बाद वही पानी वापस धक्का दे गया। चप्पू तो हवा में था, फिर भी नहर जवाब दे रही थी।
अक्सर हम मान लेते हैं कि पानी तुरंत सब भूल जाता है, हर बार चप्पू शांत पानी में पड़ेगा। हल्के झटकों में ये ठीक लगता है। लेकिन तेज चप्पू, धीमे भंवर, या छोटी साइड-नालियाँ हों तो पुरानी लहरें लौट आती हैं। कुछ बहुत छोटे यंत्रों के आसपास भी माहौल ऐसा ही याद रखता है।
मैंने तय किया, हर बार अंदाज़ा नहीं लगाऊँगा। मैं नहर के लिए एक चलने वाला “रास्ता-नक्शा” बनाऊँगा जो बताए कि चप्पुओं की कोई भी चुनी हुई लय के बाद नाव कैसे चलेगी। उसी तरह, “प्रोसेस टेंसर” नाम की चीज़ कामों की पूरी कड़ी लेकर हर कदम पर सिस्टम की हालत बताने की कोशिश करती है। सीख ये कि जब आसपास याद रखता हो, तब भी यह कड़ी का हिसाब रखती है।
नक्शा बनाते समय एक फर्क साफ हुआ। एक असर नाव का अपना है, चप्पू पड़ते ही वह आगे बढ़ती है। दूसरा असर नहर का है, जो बची हुई लहरों को आगे ढोकर बाद में लौटा देती है। यहाँ चप्पू हमारे चुने काम हैं, नहर आसपास का माहौल है, और लौटती लहरें समय के अलग पलों को जोड़ने वाली “याद” हैं।
पहले लगा ये नक्शा तो बहुत भारी होगा, क्योंकि चप्पू चलाने के तरीके अनगिनत हैं। फिर राहत मिली, ज़्यादातर नहरें हमेशा याद नहीं रखतीं; लहरें थक जाती हैं। तब नक्शा छोटे-छोटे जुड़े टुकड़ों की तरह रखा जा सकता है, जहाँ बस कुछ जोड़ ही काम के रहते हैं। कुछ नहरों में तो असर बस दूरी पर टिकता है, तो वही जोड़ बार-बार दोहरते हैं।
अब मैं अलग-अलग अभ्यास योजनाएँ जल्दी आज़मा सकता था, एक चप्पू नहीं, पूरी ताल। मैं ये भी पूछ सकता था कि अभी का हल्का थपका बाद में पड़ने वाले चप्पू को कैसे बदल देता है। नहर का धक्का बंद नहीं हुआ, लेकिन फर्क ये था कि अब वह धक्का अचानक नहीं लगता था; वह नक्शे में दर्ज था, और उसी हिसाब से मैं अपनी चाल चुन सकता था।