अभिलेखागार की मेज़ पर छूटी हुई आवाज़ों का हिसाब
पुराने अभिलेखागार में मैं मेज़ पर रिकॉर्डिंग की पर्चियाँ फैलाता हूँ। तारीखें साफ, सारांश भी साफ। फिर दिखता है, ज़्यादातर वही लोग आए जो समय, सफर और हिम्मत जुटा पाए। सीख वही बनती है, जिसे दरवाज़ा अंदर आने देता है।
लोग पूछते हैं, गर्भावस्था में धूम्रपान का बच्चे के वज़न पर औसतन क्या असर पड़ता है। बात ये है कि लोग सिक्का उछालकर धूम्रपान नहीं चुनते। तनाव, घर का सहारा, आमदनी, सेहत, मोहल्ले की आदतें, सब फैसला भी बदलते हैं और नतीजा भी।
अभिलेखागार में भी पर्ची पर उम्र, काम, इलाका लिखा है, पर डर, शोक, इलाज न मिला रोग, ये नहीं। अगर यही छुपी बातें तय करें कि कौन आएगा और क्या बोलेगा, तो मेज़ पर बना साफ सारांश धीरे से गलत दिशा में खिसक सकता है।
नई तरकीब ऐसे चलती है जैसे मैं दो काम साथ कर रहा हूँ। पहले, लिखी बातों से अंदाज़ा, कौन-सा व्यक्ति रिकॉर्ड होने वाली ढेरी में आने की कितनी संभावना रखता था। फिर, उन्हीं बातों से अंदाज़ा, उसका नतीजा आम तौर पर कैसा होता। दोनों जोड़कर, जो कम आने वाले थे उनकी बात का वजन बढ़ता, और नोट्स किसी एक अजीब रिकॉर्डिंग को हद से ज़्यादा खींचने नहीं देते।
फिर मैं एक घुंडी रखता हूँ, छुपी वजह कितनी जोर से दो चीज़ों को जोड़ती है, दरवाज़े से छनना और नतीजा। घुंडी दाईं भी जा सकती है, बाईं भी, यानी छुपी वजह असर को बढ़ा भी सकती है, घटा भी सकती है। धूम्रपान वाले सवाल में, दो घुंडियाँ सोचनी पड़ती हैं, एक धूम्रपान करने वालों के लिए, एक न करने वालों के लिए।
क्योंकि असल घुंडी कोई नहीं जानता, मैं एक जवाब नहीं, जवाबों की पट्टी बनाता हूँ। हर ठीक-ठाक घुंडी पर एक सामान्य भरोसे की सीमा निकलती है, पर ये भरोसा तभी टिकता है जब छुपा असर, उपलब्ध रिकॉर्डिंग की मात्रा के मुकाबले बहुत बड़ा न हो। फिर सारी सीमाएँ मिलाकर एक चौड़ी पट्टी बनती है।
एक और पेच तब आता है जब घुंडी छोटी नहीं होती। छुपे उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा अगर सिर्फ आत्मविश्वासी आने वालों से लगाऊँ, तो वह गलत पढ़ सकता है, क्योंकि दरवाज़ा खुद ही अलग किस्म के लोग चुन रहा था। सुधार करके यह तरीका कम कड़ी शर्त पर भी संभल जाता है, फिर भी असीम भरोसे का वादा नहीं करता।