अलमारी के शोर में छुपा सुराग
नाटकघर की अलमारी में मैं हर थोड़ी देर में रैक पर नज़र डालता और गिनती लिखता। आज ज़्यादातर भारी सर्दी के कोट हैं, कुछ हल्के रेनकोट। अजीब बात ये कि कागज़ पर कुल गिनती वही रहती, पर कभी माहौल शांत, कभी हाथों की बरसात।
यही उलझन जीती-जागती दुनिया में भी होती है। किसी जगह जानवर गिनो, या दो तरह की कोशिकाएँ साथ बढ़ रही हों, तो अक्सर बस कुल संख्या मिलती है। कुल पाँच बढ़े, पर पता नहीं पाँच आए और कोई नहीं गया, या बहुत आए और लगभग उतने ही चले गए।
पुरानी सोच में मैं बस इतना कह दूँ, जितने आए माइनस जितने गए, उतना बदलाव। लेकिन फिर दो अलग नियम एक जैसी कुल गिनती दिखा सकते हैं। रैक भरने पर या तो लोग कोट जमा करना कम कर दें, या लोग जल्दी निकालने लगें। दोनों से औसत गिनती मिलती-जुलती रह सकती है।
फिर मेरी नज़र शोर पर गई। अगर मैं छोटे-छोटे अंतराल में कई बार झाँकूँ, तो औसत बदलाव बताता है दिशा, और ऊपर-नीचे की उछाल बताती है अंदर कितना आना-जाना चल रहा है। अलमारी में औसत बदलाव आए माइनस गए है, और उछाल तब बढ़ती है जब दोनों तरफ भागदौड़ तेज हो। छोटा सा निचोड़: औसत से फर्क, उछाल से जोड़।
काम चलाऊ बनाने के लिए मैं हालात को टोलियों में बाँटता। जब रैक पर इतने सर्दी के कोट और इतने रेनकोट हों, तो अगले पल में आमतौर पर क्या बदलाव आता है, और कितना बिखरता है। इससे हर तरह के कोट के लिए जमा होने और निकलने की रफ़्तार का अंदाज़ा बनने लगा, बिना पहले से नियम तय किए।
फिर फर्क साफ दिखा। अगर भीड़ ज़्यादा होने पर लोग जमा करना रोकते हैं, तो कुल गिनती काफ़ी स्थिर लगती है। अगर भीड़ निकलवाने को बढ़ाती है, तो गिनती ज्यादा डोलती है, चाहे बीच का स्तर करीब-करीब वही रहे। एक अकेला खास रेनकोट टिकेगा या नहीं, ये इस पर ज्यादा टिका था कि बाकी कोट उसकी किस्मत कैसे बदलते हैं।
घर लौटते वक्त नोटबुक बंद करते हुए बात सीधी लगी। सिर्फ रेखा कहाँ जा रही है, ये काफी नहीं। छोटे, बेतरतीब उतार-चढ़ाव बता सकते हैं कि असल में रोका क्या जा रहा है, आना, जाना, या दोनों। अलमारी का वो शोर अब बेकार नहीं लगा; वही सुराग था जिससे दो छुपी कहानियाँ अलग हो गईं।