बादलों के बीच एक सही घेरा कैसे बना
समुद्र किनारे लोग कैमरा और घड़ी मिलाकर खड़े थे। कुछ ही देर में छल्ले जैसा सूर्यग्रहण होना था, लेकिन पतले बादल बार-बार सामने आ रहे थे। एक जगह से साफ तस्वीर मुश्किल थी, तो सबने सोचा, जितना मिले उतना पकड़ लो।
वैसी ही जिद एक बहुत दूर की चीज के लिए थी। एक आकाशगंगा के बीच में M87* नाम का स्रोत, जहां काला छेद माना जाता है। उम्मीद थी कि आसपास की गरम गैस की रोशनी मुड़कर एक घेरा बनाएगी, और बीच अंधेरा लगेगा क्योंकि रोशनी अंदर गिर जाती है।
दिक्कत ये थी कि वो घेरा धरती से इतना छोटा दिखता कि कोई एक दूरबीन उसे सीधे नहीं देख सकती। तो अलग-अलग जगहों पर कई रेडियो दूरबीनें एक ही समय पर वही हल्की तरंगें दर्ज करने लगीं, जैसे अलग शहरों से एक साथ ग्रहण की फोटो लेना।
फिर सबसे जरूरी काम हुआ। सबने समय को बहुत सख्ती से मिलाया, छोटी-छोटी चूकों को पकड़ा, और उन बिखरे संकेतों को जोड़कर ऐसा बनाया जैसे धरती खुद एक बड़ी कैमरा-आंख हो। सीख सीधी है, अलग-अलग अधूरी झलकें भी एक ही घड़ी पर हों तो जोड़कर साफ दृश्य बन सकता है।
डर ये भी था कि कहीं घेरा जोड़ने की चाल न हो। इसलिए अलग-अलग समूहों ने अलग तरीके से तस्वीर बनाई, अलग रातों के नतीजे मिलाए, और तुलना बराबर रखने के लिए सबकी तीक्ष्णता एक जैसी रखी। हर बार वही लगभग गोल घेरा दिखा, और बीच का हिस्सा बहुत धुंधला रहा।
घेरा हर तरफ एक जैसा चमकीला नहीं था। एक तरफ ज्यादा उजाला टिकता रहा, बस चमकीला हिस्सा थोड़ा खिसकता था। ग्रहण की फोटो में ऐसा बादलों या कैमरे से हो सकता है, लेकिन यहां वजह यही मानी जाती है कि गैस बहुत तेज घूम रही है और जो हिस्सा हमारी तरफ आता है, उसकी रोशनी ज्यादा उभरती है।
फिर उस घेरे के आकार को समझने के लिए कंप्यूटर पर कई संभावित दृश्य बनाए गए, जिनमें तेज गुरुत्व और गरम गैस के नियम चलते हैं, और उन्हें उसी तरह “देखकर” मिलाया गया जैसे असली दूरबीनों ने देखा था। इससे अंदाजा लगा कि काले छेद का द्रव्यमान सूरज के मुकाबले अरबों गुना के आसपास है, और कुछ ऐसे दृश्य बाहर हो गए जो असल में जितनी शांति दिखी, उससे कहीं ज्यादा डांवाडोल होते।
पहले उस दूर की आकाशगंगा का केंद्र बस एक चमकता बिंदु था। अब वह बादलों में फंसी कई तस्वीरों को जोड़कर बने एक पक्के छल्ले जैसा है, बीच में गहरा सा खालीपन लिए। जैसे अलग-अलग किनारों से ली गई ग्रहण की झलकें मिलकर एक ही घेरा मान लेती हैं, वैसे ही यहां भी एक ही आकार बार-बार लौट आया।