दो रस्सियों की खींच, और याददाश्त का छोटा सा पलटा
अंधेरी थिएटर वर्कशॉप में मैं चरखी पर लगी छोटी पट्टी देख रहा था। दो पतली रस्सियाँ थीं। दोनों को एक ही तरफ खींचो तो पट्टी पलटती और निशान बाएँ या दाएँ टिक जाता, बिजली जाए तब भी।
पुराने सेट में रस्सियों और चरखी के बीच एक भारी जोड़ लगा रहता था। जगह खाता था और पास की हल्की चुंबकीय फड़फड़ाहट से भी गड़बड़ा जाता था। बहुत सारे सेट लगाओ तो पूरा बोर्ड मोटा और नाज़ुक हो जाता।
नया जुगाड़ उस भारी जोड़ को हटा देता है। अब दोनों रस्सियों का जोर सीधे उसी छोटी कुंडी पर मिलता है जहाँ पट्टी पलटती है। एक रस्सी अकेली, या दोनों उलटी दिशा में, तो कुंडी नहीं छूटती। दोनों साथ हों तो कुंडी चटकती है और निशान साफ पलट जाता।
पढ़ने के लिए एक तीसरी, बहुत हल्की खींच होती है, बस जाँचने भर की। यह खींच किनारे वाली जाँच-पट्टी को छेड़ती है, असली पट्टी को नहीं। निशान जिस तरफ टिका हो, उसी हिसाब से जाँच में छोटा संकेत निकलता है, और निशान मिटता नहीं।
फिर ऐसे कई सेट चौकोर जाल में लगा दिए जाते हैं। एक रस्सी पूरी कतार के लिए, दूसरी रस्सी एक खांचे के लिए, और जहाँ दोनों मिलती हैं वहीं कुंडी छूटती है। जाँच की साझा रस्सी में पुरानी थरथराहट बच जाए तो थोड़ा रुकना पड़ता है, वरना संकेत गड्डमड्ड होते हैं।
एक दिन स्टाफ ने एक ही खांचे में कई सेटों की हल्की जाँच एक साथ दबाई। जिन सेटों में निशान एक तरफ था, उन्होंने साझा रस्सी को थोड़ा-थोड़ा खींचा, और खिंचाव जुड़ता गया। आख़िर में छोर पर लगा गिनने वाला हिस्सा सिर्फ हाँ-ना नहीं, कुल खिंचाव भी पकड़ लेता है।
मैंने पट्टी को देखा और पुराने भारी जोड़ की जगह याद आई। अब लिखना भी दो सीधी खींच से हो जाता है, पढ़ना भी हल्की जाँच से, और निशान टिकाए रखने को लगातार जोर नहीं चाहिए। वही साझा रस्सी, जो पहले बस खबर देती थी, कई जगहों का जोड़ भी अपने आप समेट लेती है।