बिना उस्ताद की कला
सोचिए एक ऐसे आर्ट स्टूडियो की जहाँ गहरा सन्नाटा है। यहाँ कोई उस्ताद उंगली रखकर नहीं बताता कि 'यह बिल्ली है' या 'यह फूलदान है'। एक नया कलाकार यहाँ सिर्फ अपने सीनियर साथी की ड्राइंग देखकर ही सब सीखता है, बिना किसी निर्देश के।
यह खेल नजरिए का है। नया कलाकार तस्वीर के एक नन्हे हिस्से को बहुत करीब से देखता है, जबकि सीनियर पूरी तस्वीर देखता है। नए कलाकार को उस छोटे हिस्से से पूरी कहानी समझकर सीनियर जैसा चित्र बनाना होता है।
यहाँ एक चालाकी हो सकती है। अगर दोनों आलस करें, तो वे अपने कैनवस को पूरा काला रंग सकते हैं। तब दोनों की पेंटिंग बिल्कुल एक जैसी दिखेगी, पर उन्होंने सीखा कुछ नहीं। इसे 'कोलाप्स' कहते हैं जहाँ जवाब तो सही है पर बेकार है।
इस धोखे को रोकने के लिए नियम बने। सीनियर को हर बार अलग चित्र बनाना होगा और लकीरें एकदम साफ रखनी होंगी, धुंधली नहीं। इससे नए कलाकार को भी सटीक काम करना पड़ता है और वह शॉर्टकट नहीं ले सकता।
असली राज यह है कि वह सीनियर कोई दूसरा इंसान नहीं है। वह 'उस्ताद' असल में इसी कलाकार के पुराने चित्रों का एक सुलझा हुआ रूप है। यानी कलाकार अपने ही पिछले काम के बेहतर रूप को देखकर खुद को सिखा रहा है।
इस कोशिश में एक जादू होता है। बिना नाम जाने चीजों को पहचानने की होड़ में, कलाकार खुद-ब-खुद चीजों की बाहरी लकीरें बनाना सीख जाता है। उसे समझ आ जाता है कि वस्तु कहाँ खत्म होती है और बैकग्राउंड कहाँ शुरू।
इसी तरह कंप्यूटर अब इंसानों की तरह देखना सीख रहे हैं। उन्हें किसी इंसान द्वारा बॉक्स बनाकर बताने की जरूरत नहीं है। वे खुद अपनी गलतियों से सीखकर समझ जाते हैं कि तस्वीर में क्या खास है और क्या अलग।