एक रिकॉर्डर ने शोर में छिपी सात धुनें पकड़ लीं
अभी सुबह भी नहीं हुई थी। सामुदायिक हॉल में मैं कुर्सी पर छोटा रिकॉर्डर रखकर रिकॉर्ड दबाता हूँ। पीछे से गरमाहट की आवाज़ एक ही गड़बड़ धप्प लगती है, पर कान कहता है इसमें कई तालें छिपी हैं। लंबी, बिना रुके सुनाई एक धप्प को अलग-अलग तालों में तोड़ देती है।
पहले मैं बस थोड़ी-थोड़ी देर के टुकड़े रिकॉर्ड करता था। तभी दरवाज़ा खुलता, कोई खाँसता, बाहर से गाड़ी निकल जाती। आसमान देखने में भी ऐसा ही होता है, बादल और दिन की रोशनी बीच में कट लगा देती है। तब एक ही जैसी हल्की-सी कमी कभी एक ग्रह लगती, कभी दूसरे की।
फिर मैंने जिद पकड़ ली। रिकॉर्डर लगभग लगातार चलता रहा, जैसे पूरी रिहर्सल एक साथ पकड़नी हो। ऊपर से देखने वाला यंत्र भी कई दिनों तक बिना रुके उसी तारे को देखता रहा, ऐसी रोशनी में जहाँ तारा ज्यादा एक-जैसा दिखता है। जमीन से देखने वाले यंत्र भी बीच-बीच में जाँच करते रहे।
पूरा रिकॉर्ड हाथ में आते ही गड़बड़ धप्प के अंदर अलग-अलग धड़कनें सुनाई देने लगीं। लगातार निगरानी में कई बार तारे की रोशनी साफ-साफ घटी, और दोहराते पैटर्न छँट गए। जो पहले घुल-मिल गया था, उसमें नए ग्रहों की चालें दिखीं। एक बार एक अकेली, तेज कमी भी आई जो फिर नहीं लौटी, जैसे कोई वादक बस एक ही बार आकर चला गया।
अब हर कमी का मतलब पढ़ा जा सकता था। रोशनी जितनी ज्यादा कटे, ग्रह उतना बड़ा, जैसे बड़ा शरीर स्पॉटलाइट को ज्यादा ढक दे। कमी जितनी देर चले, वह पार कितनी तेजी से जा रहा है, उसका अंदाज़ मिलता है। कई ग्रह धरती के आस-पास आकार के निकले, और कुछ उससे छोटे, जैसे मंगल और धरती के बीच।
तालें बिलकुल घड़ी जैसी नहीं थीं। कुछ धप्प थोड़ा पहले आया, कुछ देर से, जैसे वादक एक-दूसरे को हल्का-सा खींचकर समय बिगाड़ दें। ऐसा इसलिए होता है कि ग्रह एक-दूसरे को गुरुत्व से खींचते हैं। इन छोटे-छोटे फिसलनों से उनके वजन का अंदाज़ सिमटता है, पर अभी भी एक से ज्यादा जवाब सही बैठ सकते हैं।
अब हॉल एक उलझा धप्प नहीं था। वह कम से कम सात हिस्सों वाली मंडली जैसा लग रहा था, और कुछ ग्रह ऐसे फासले पर हैं जहाँ सही हवा और बादलों में पानी टिक भी सकता है। नया कमाल बस ग्रह गिनना नहीं था, बल्कि इतना देर तक देखना कि वे अलग दिखें, और उनकी छोटी देर-सबेर से उनका वजन टटोला जा सके। मैं रिकॉर्डर बंद करता हूँ, और कमरे की चुप्पी भी अब साफ सुनाई देती है।