फाटक पर नक्शा, जुर्माने की किताब, और एक ‘सुरक्षा ठप्पा’
भोर से पहले पहाड़ी अभयारण्य के फाटक पर गाइड ने बेंच पर पुराना नक्शा फैलाया। नियम बोर्ड साफ था: वही रास्ता चलेगा जो दफ्तर की परमिट सूची से भी मेल खाए। ऊपर से फीस की किताब ऐसी कि हर पन्ने पर कई जुर्माने, और गिना जाएगा उसी पन्ने का सबसे बड़ा जुर्माना।
बात ये है कि गाइड एक दिन के लिए नहीं, पूरे मौसम के लिए रास्ता चुन रहा था। मौसम कैसा होगा, कोई नहीं जानता। उसके पास बस कुछ औसत नोट थे, जैसे औसत हवा, और दो-तीन मोटी सीमाएँ। उन्हीं से अनगिनत “मौसम-कहानियाँ” बन सकती थीं।
गाइड ने एक कदम-सा नक्शे पर खिसकाया और फीस का “सबसे बड़ा जुर्माना” अचानक बदल गया। किताब में छोटे बदलाव पर नतीजा उछलता था। नया विचार यही था: पहले कई जुर्मानों में से सबसे खराब चुनो, फिर कई पन्नों में से सबसे सस्ता पन्ना चुनो, और फिर भी हिसाब ठीक-ठीक रखा जा सकता है।
रेंजर ने कहा, “हर पन्ने के जुर्मानों को तुम मिलाकर एक ही चेतावनी बना सकते हो, जैसे बराबरी से मिलाया हुआ मिश्रण।” शर्त बस इतनी कि हिस्से नकारात्मक न हों और सब मिलकर एक बनें। फिर रेंजर ने परमिट वाले छुपे नियमों के लिए एक “स्कोर शीट” जोड़ी, जो बिना हर कोड लिखे मिलान कराती थी। अगर यह पूरा हिसाब कुछ वर्गों के जोड़ जैसा लिखा जा सके, तो वह कभी ऋणात्मक नहीं होगा। यही जाँचने लायक सुरक्षा ठप्पा है।
उस ठप्पे के बाद मौसम वाली उलझन बदल गई। अब गाइड को हर संभव “मौसम-कहानी” ढूँढनी नहीं पड़ी। एक बड़ी चेकलिस्ट हल करनी पड़ी, जहाँ कुछ डिब्बे हमेशा धनात्मक रहने चाहिए और वही वर्गों वाली शर्तें उन्हीं डिब्बों में बदल जाती हैं। साफ हालात में, जैसे नियमों में थोड़ा सा खालीपन और सीमित इलाका, इस चेकलिस्ट का जवाब असली सबसे अच्छे जवाब से बिल्कुल मिल जाता है।
और जवाब सिर्फ एक रकम नहीं था। उसी चेकलिस्ट से कुछ गिने-चुने “नमूना दिन” निकल आए, हर दिन के साथ उसका हिस्सा। नक्शे पर यह ऐसा लगा जैसे डरावना मौसम धुंध नहीं, बस दो-तीन ठोस हालात हैं जिनसे औसत भी बनते हैं और सबसे खराब हालत भी पूरी होती है।
गाइड ने नक्शा मोड़ा तो उसे फर्क साफ दिखा। पहले वह अनगिनत मौसमों के जंगल में भटक रहा था। अब उसके हाथ में एक जाँचने लायक ठप्पा था, एक हल होने वाली चेकलिस्ट थी, और अंत में कुछ गिने-चुने हालात थे जिनकी तरफ उंगली रखकर कहा जा सके, “यही सबसे खराब मौसम है, और यही सबसे सही रास्ता।”