थोड़ी ढील, और खोज अचानक तेज
हॉल अभी अंधेरा था। मंच प्रबंधक ने बाहर खड़े लोगों में से कुछ को भीतर बुलाया और मन ही मन गिना, क्या इतने से लोग रोशनी, माइक और दरवाजों की सारी ड्यूटी संभाल लेंगे, या कहीं कोई कोना खाली रह जाएगा।
ऐसी बहुत सी कठिन खोजें इसी तरह चलती हैं। अगर एक दल काम चला दे, तो उसमें और लोग जोड़ने से काम बिगड़ता नहीं। मुश्किल बस इतनी है कि सबसे छोटा कामचलाऊ दल मिले। पुराने तेज रास्ते में किस्मत बहुत कड़ी थी, शुरू में पकड़ा गया हर नाम उसी छिपे सबसे छोटे सही दल का होना चाहिए था।
नई चाल ने यही गांठ ढीली की। अगर थोड़ा बड़ा जवाब मान्य हो, तो शुरुआती पकड़ को पूरा सही होना जरूरी नहीं। बस उतने जरूरी लोग मिल जाएं जितने उस मान्य ढील के हिसाब से चाहिए, फिर कमरे में बचे लोगों में से तेज कदम बाकी खाली जगहें भर देता है।
यहीं बात पलटती है। शुरू में ज्यादा लोगों को अलग करोगे तो बाद का काम छोटा होगा, लेकिन सही लोगों का जरूरी हिस्सा मिलना कठिन होता जाएगा। इस चाल ने वही मोड़ पकड़ा, जहां एक और नाम खींचना फायदे से ज्यादा बोझ बन जाता है। बिना ढील के खेल फिर पुराने कड़े रास्ते पर लौट आता है।
और अगर किस्मत पर भरोसा न करना हो, तब भी रास्ता बंद नहीं होता। मंच प्रबंधक पहले से छोटी-छोटी सूचियां बना सकता है, ऐसी कि किसी भी छिपे सही दल के लिए कम से कम एक सूची में जरूरी लोग पर्याप्त मात्रा में आ जाएं। रफ्तार में थोड़ा खर्च बढ़ता है, पर बढ़त काफी हद तक बची रहती है।
फायदा कई कठिन कामों में दिखा, जैसे कम से कम बिंदु चुनकर हर जोड़ को छू लेना, या थोड़ी सी अड़चनें हटाकर घूमते चक्कर तोड़ देना। ऊपर से यह कटौती बहुत छोटी लगती है। लेकिन जब वही बचत बार-बार दोहरती है, तो फर्क बढ़ जाता है। पहले बस बिलकुल सही शुरुआती पकड़ की कीमत थी, अब थोड़ी सही पकड़ भी काम की हो जाती है।