अंधेरी सुरंगों में भी सही रफ्तार कैसे तय होती है
रात की ट्रेन पहाड़ की सुरंगों में घुसती है। चालक का एक हाथ रफ्तार वाले हत्थे पर है, दूसरा खिड़की के पास चिपके पुराने चार्ट पर। धीमे गए तो अगला स्टेशन छूटे, तेज गए तो ढलान पर ब्रेक गरम हो जाए।
ब्रह्मांड की बढ़त भी कुछ ऐसी ही है। कोई बाहर खड़ा होकर पूरी यात्रा नहीं देख सकता। बस दूर-दूर से मिले इशारे हैं। हैरानी ये कि पहले बढ़त धीमी पड़ती दिखती है, पर हाल के समय में जैसे फिर से तेज हो रही हो।
लोगों ने उस चार्ट जैसा ही एक “रफ्तार-नक्शा” बनाया, अलग-अलग दूरियों पर बढ़त कितनी थी। उन्होंने आम योजना में एक छोटा जोड़ रखा, ε log(1+z) जैसा, जिसका असर ε के चिन्ह और मान पर टिका है। मतलब, कम और बहुत दूर के इशारों में फर्क की गुंजाइश।
फिर नक्शे को दो तरह के आकाश-इशारों से मिलाया। एक में आकाशगंगाओं की उम्र बदलती दिखती है, दूसरे में कुछ फटते तारों की चमक दूरी बताती है। उम्र वाले इशारों और दोनों को साथ लेने पर ε बार-बार शून्य के पास लौट आया, पर सिर्फ तारों वाले हिसाब में ε शून्य से हट सकता था और गलती की गुंजाइश भी बड़ी थी।
अब उसी रफ्तार-नक्शे को उन्होंने गुरुत्व की दो “किताबों” में रखकर देखा। पहली में द्रव्य और जगह का संबंध साधारण रखा गया। दूसरी में द्रव्य सीधे तौर पर जगह की मुड़न के नियम से जुड़ जाता है। दोनों रास्तों से हाल के समय में एक असर ऐसा निकला जो धक्का देने जैसा है, और बदलाव धीरे-धीरे होता दिखा।
फिर उन्होंने सुरक्षा-जैसे कुछ सीधे नियम देखे, जैसे ट्रेन में तापमान और दबाव की हदें देखी जाती हैं। ज़्यादातर बातें ठीक रहीं, कोई अजीब उलटा हिसाब ज़रूरी नहीं पड़ा। लेकिन एक कड़ा नियम, जो कहता है कि सिर्फ गुरुत्व से बढ़त हमेशा धीमी होनी चाहिए, हाल के दौर में उलटता दिखा। चार्ट पर नजर गई, और लगा, केवल ढलान और ब्रेक से बात नहीं बनती।