जाल के गांठों से संकेत पढ़ने की तरकीब
छोटे बंदरगाह के शेड में मैंने फटा मछली पकड़ने का जाल मेज पर फैलाया। कुछ गांठों पर चमकीला टेप था, बाकी खाली। सवाल सीधा था, हर गांठ किस हिस्से की है, ये सब पर टेप लगाए बिना कैसे पता चले?
जाल जैसा ही हाल जुड़ी हुई चीज़ों में होता है, जैसे पन्ने जो एक-दूसरे को जोड़ते हैं। थोड़े से पन्नों की पहचान पक्की होती है। पुराने तरीके या तो हर चीज़ को अकेला देखकर अंदाज़ा लगाते थे, या जोड़-तोड़ को ऐसे नियमों से चलाते थे जो सीखते नहीं थे।
नई चाल बड़ी नहीं, छोटी और बार-बार वाली थी। हर गांठ अपने बारे में जो जानती है, उसमें पास की गांठों की बात मिलाकर एक नई चिट्ठी लिखती है। ये काम कुछ ही चक्कर चलता है, ताकि संकेत दो-तीन कदम तक जाए, पूरे शेड में उछल-कूद न करे।
एक छोटा जोड़ खेल बदल देता है। हर गांठ को अपनी ही तरफ एक छोटा सा फंदा मानो, ताकि अपनी बात थोड़ी बची रहे। फिर मिलाना बराबरी से हो, ताकि बहुत ज्यादा डोर वाली गांठ सबकी आवाज़ न दबा दे। सीख यही, दूर तक नहीं, ठीक से पास-पास मिलाना।
अब जिन गांठों पर टेप है, वही कसौटी बनती हैं। उन्हीं से जाल अपने कुछ छोटे-छोटे घुंडीदार फैसले ठीक करता है, कि किस संकेत पर कितना भरोसा करना है। कुछ चक्करों में ही बाकी गांठों के लिए भी ठीक-ठाक अंदाज़े बनने लगते हैं, और हर चक्कर में बस डोरों पर एक बार हाथ जाता है।
जब ऐसे ही जुड़े कागज़ों और बड़े ज्ञान-नक्शों पर ये तरीका आज़माया गया, तो पुराने तरीकों से बेहतर और तेज़ नतीजे मिले। मैं जाल को देखता रहा और बात साफ लगी, हर गांठ पर टेप नहीं चाहिए, और पूरा जाल एक झटके में भी नहीं समझना पड़ता।