छोटी टोली, लंबी रिहर्सल, और बड़ा दांव
छोटे थिएटर के काम वाले कमरे में लकड़ी का बुरादा हवा में तैर रहा था। घूमने वाली टोली एक ही ट्रक में सपाट सीन भर रही थी। निर्देशक सोच में था: बहुत सारे कलाकार लें, या कम लोग रखकर रात-रात भर रिहर्सल करें?
सबको लगा, ज्यादा कलाकार मतलब ज्यादा संवाद याद, शो बेहतर। बात ये है कि सफर में बड़ी टोली महंगी और भारी पड़ती है। जैसे जवाब देने वाली मशीन में ज्यादा अंदरूनी घुंडी हों तो हर जवाब में ज्यादा समय और बिजली लग सकती है। सीख: खर्च मायने रखे, तो मोटाई से ज्यादा अभ्यास काम आता है।
तो उन्होंने छोटी टोली चुनी और रिहर्सल बढ़ा दी। इसी सोच में LLaMA बनाने वालों ने छोटे से बड़े कई आकार बनाए, और छोटे वालों को बहुत ज्यादा पढ़ाया। उन्होंने सिर्फ खुली लिखाई ली: साफ किए वेब पन्ने, कई भाषाओं की ज्ञान-सामग्री, किताबें, कोड, सवाल-जवाब वाली जगहें, और विज्ञान वाली लिखाई भी। लंबी रिहर्सल से सबसे छोटी टोली भी रुकने की बजाय आगे बढ़ती रही।
इतनी रिहर्सल तब ही चलती है जब कमरे में अफरा-तफरी न हो। मंच पर साफ निशान, रोज की तय दिनचर्या, और ऐसे संवाद जिनमें सांस न टूटे। LLaMA में भी परदे के पीछे ऐसे इंतजाम किए गए कि लंबी लिखाई में वह जगह न भूले, सीखते वक्त डगमगाए नहीं, और अभ्यास तेज चले। काम कई मशीनों में बांटकर संकेत ठीक से पास किए गए।
पहली रात छोटी टोली ने ऐसे सीन साधे जो आम तौर पर बड़ी मंडली मांगते हैं। वैसे ही बताया गया कि LLaMA का मध्यम आकार कई कामों में पुराने, बहुत बड़े आकार से आगे निकला, और सबसे बड़ा आकार भी बड़े नामों के बराबर टिक गया। गणित और कोड में वह तब ज्यादा चमका जब उसने कई कोशिशें लिखकर सबसे मेल खाती कोशिश चुनी, जैसे कलाकार कई टेक लेकर साफ टेक चुनते हैं।
तालियों के बाद निर्देशक ने नोट किया कि कुछ बातें गलत भी निकल आईं। बड़ी टोली में कभी-कभी संवाद ज्यादा कड़वे हो जाते, और पुराने ठप्पे भी घुस आते। LLaMA में भी आकार बढ़ने पर कुछ जगह जहरीली बातें बढ़ सकती हैं, और कुछ पक्षपात दिख सकता है; वह कभी-कभी भरोसे से गलत जवाब भी गढ़ देता है। फिर भी दांव समझ आया: खुली लिखाई पर लंबा अभ्यास करके छोटी मशीन भी मजबूत बन सकती है, बस सचाई और सुरक्षा अपने आप नहीं आती।