जब फ़र्ज़ी खातों ने नाटक मंडली की तरह किरदार बाँटे
मोहल्ले की नाटक मंडली में हर कलाकार एक किरदार चुनता है। कोई मेयर बनता है, कोई मास्टरजी, कोई दुकानदार। किरदार चुनते ही उसकी हर हरकत तय हो जाती है। दुकानदार अचानक चालान नहीं काट सकता, मेयर होमवर्क नहीं पूछ सकता। ठीक ऐसे ही हज़ारों फ़र्ज़ी खातों ने काम किया, हर खाते ने एक अमेरिकी किरदार ओढ़ा और फिर उसी साँचे में फँस गया।
ये फ़र्ज़ी खाते एक बड़े सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर आम अमेरिकियों का भेस धरकर बैठे थे। पहले इन्हें पहचानने की कोशिश बस इतनी थी कि खाता दक्षिणपंथी है या वामपंथी, डर फैलाता है या ख़बरें। लेकिन ये सब बताता था कि खाता क्या कह रहा है, ये नहीं कि वो किसका किरदार निभा रहा है। जैसे नाटक के संवादों को हँसी या ग़म में बाँटो, मगर किरदार ही न पूछो।
नई सोच ये थी कि हर फ़र्ज़ी खाते को उसके चुने हुए किरदार से पहचानो। चार किरदार सामने आए। कुछ खाते छोटे शहर के अख़बार बने हुए थे, तटस्थ ख़बरें छापते। कुछ किसी संगठन या आंदोलन का चेहरा बने। कुछ ज़ोरदार राजनीतिक शख़्सियत का रोल करते। बाक़ी आम लोग बनकर मौसम और सीरियल की बातें करते। हर किरदार की अपनी लक्ष्मण रेखा थी।
बात ये है कि आधे से ज़्यादा पोस्ट राजनीतिक थीं ही नहीं। वो छलावा थीं, सोमवार की शिकायत, किसी शो पर राय, बस खाते को असली दिखाने के लिए। नाटक में दुकानदार को पहले ठीक से सामान सजाना पड़ता है, ग्राहकों से बात करनी पड़ती है, तभी तीसरे अंक की अहम लाइन भरोसेमंद लगती है। ये छलावा हर किरदार अलग तरीक़े से करता था, और वही निशान बन गया।
पहले कुछ खातों की प्रोफ़ाइल पढ़कर उन्हें हाथ से चारों किरदारों में बाँटा गया। फिर जिन खातों की प्रोफ़ाइल छिपी थी, उनके हैशटैग के ढर्रे को पहले से बँटे खातों से मिलाया गया। जैसे मंच पर पर्दा आधा गिरा हो, तो भी कलाकार की चाल और हाव-भाव से पहचान हो जाती है। इसी ढर्रे से एक कंप्यूटर ने सीखा कि कौन-सा किरदार कैसे पोस्ट करता है, कितने लोग जुड़ते हैं, कितना जवाब देता है।
नतीजा काफ़ी सटीक निकला। दूसरे लोगों की अलग छँटाई से मिलाने पर भी सही पहचान का अनुपात बहुत ऊँचा रहा। एक बिलकुल अलग भाषा के खातों पर आज़माया तो वही ढर्रा दिखा। दुकानदार का किरदार हिंदी में हो या रूसी में, सामान सजाने का तरीक़ा बदलता नहीं।
ये तरीक़ा असली खातों में से नक़ली छाँटने के लिए नहीं है। एक बार नक़ली खाते मिल जाएँ, तो ये बताता है कि पूरा जाल कैसे बुना गया है। कितने कलाकार कौन-सा किरदार निभा रहे हैं, किसे सबसे ज़्यादा दर्शक मिले, कौन बातें करता है और कौन सिर्फ़ आवाज़ बढ़ाता है। जैसे नाटक की कास्ट लिस्ट और मंच-निर्देश पढ़ लो तो कहानी का ढाँचा एक लाइन सुने बिना समझ आ जाए।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि लोगों को बेवकूफ़ बनाने के लिए हर फ़र्ज़ी खाते को वही उम्मीदें पूरी करनी पड़ीं जो असली इंसान या संस्था से होती हैं। और उसी पाबंदी ने निशान छोड़े, बिलकुल मंच पर कलाकार की तय हरकतों की तरह। असली दिखने की कोशिश ने ही पूरे जाल को पढ़ने लायक़ बना दिया।