जब हर टापू अपनी मर्ज़ी से चले, तो बारिश का पानी समंदर में बह जाता है
छोटे-छोटे टापुओं की एक कतार सोचो, जहाँ नावें पानी के पीपे इधर-उधर ले जाती हैं। हर टापू पर एक टंकी है जो बारिश में भरती है। जिस टापू पर बारिश हुई, वहाँ से सस्ते में पीपे खरीदो, प्यासे टापू को महँगे में बेचो। यही काम आज घरों की छतों पर लगी बैटरियाँ करती हैं, सस्ती धूप की बिजली जमा करो, शाम को बेचो। नावें बिजली के तारों जैसी हैं, सीमित जगह वाली।
अब सोचो, सुबह पश्चिमी टापुओं पर ज़ोरदार बारिश हुई। तीन टंकी-मालिक एक ही नाव पर पीपे लादने दौड़े। नाव छोटी है, सबके पीपे नहीं आते। पूरब का टापू प्यासा रह गया क्योंकि रास्ते में भीड़ जाम। असल दुनिया में यही होता है, सब बैटरी-मालिक एक साथ सस्ती बिजली भरते हैं और तारों में जाम लग जाता है। फ़ालतू ऊर्जा बर्बाद हो जाती है।
बंदरगाह का अफ़सर बोला, चलो कीमतें तय करते हैं। सुबह पानी सस्ता, दोपहर महँगा। अगर दिन में बस दो नाव-पारियाँ हों, तो ये तरकीब कमाल करती है। हर मालिक सस्ते में भरता है, महँगे में बेचता है, और एक ऐसा ठहराव आ जाता है जहाँ कोई अपनी योजना बदलना नहीं चाहता।
लेकिन फिर दिन में चार या ज़्यादा नाव-पारियाँ कर दो। कीमतें धीरे-धीरे बढ़ती हैं तो हर मालिक सोचता है, सबसे सस्ती पारी में भरो और सबसे आख़िरी महँगी पारी तक रोके रखो। दो मालिक एक-दूसरे की जगह लेते रहते हैं, कोई ठहराव ही नहीं बनता। नावें आधी खाली चलती हैं, पानी घाट पर पड़ा रहता है।
तो एक जैसी कीमत रख दें, पूरे दिन बराबर? ठहराव तो आ जाता है, लेकिन किसी को पानी हिलाने की वजह ही नहीं मिलती। सब टंकी-मालिक कंधे उचकाकर बैठ जाते हैं। शांति तो है, पर पानी जहाँ था वहीं रह गया।
बात ये है कि जितनी ज़्यादा नाव-पारियाँ, उतना बड़ा फ़र्क़ पड़ता है। सबकी भलाई का रास्ता सात छोटी-छोटी यात्राओं से गुज़रता है। स्वार्थी मालिक बस एक लंबी यात्रा चुनता है, सबसे सस्ती से सबसे महँगी तक। ज़्यादा लचीलापन मिलने पर स्वार्थी फ़ैसले और बिगड़ते हैं, ये उलटी बात है।
क्या कुछ मालिक मिलकर काम करें तो? तभी काम बनता है जब लगभग पूरी कतार साथ हो। एक भी कड़ी टूटी तो पानी आख़िरी टापू तक पहुँच ही नहीं सकता। ठीक वैसे जैसे बाल्टी-ब्रिगेड में एक आदमी हटा तो पानी रुक जाता है।
सीधी-सी बात, अकेले-अकेले फ़ैसले लेने से सीमित रास्तों वाले जाल में साझा चीज़ें बर्बाद होती हैं। एक जैसी कीमत से सन्नाटा आता है, बढ़ती कीमत से अफ़रा-तफ़री। सिर्फ़ कीमतें बदलकर ये नहीं सुलझेगा। छतों पर फैलती बैटरियों के लिए असली ज़रूरत है पूरी कतार का तालमेल, और वो काम कीमतों के बस का नहीं।