मेले के टोकन और भविष्य की कीमत
सूरज निकलने से पहले मेले का मैनेजर लोहे का डिब्बा खोलता है। मेज पर ढेर सारे प्लास्टिक टोकन खनकते हैं। यही टोकन झूले वाले, खाने के ठेले, सफाई और सुरक्षा सब लेते हैं, और मेले के अंदर ही एक-दूसरे को देकर काम चलाते हैं।
एक सतर्क पैसा लगाने वाला आता है। वह पूछता है, "छायादार बैठने की जगह और नई रोशनी का फायदा कितनी जल्दी लौटेगा?" वह आदत से दूर के फायदे को छोटा मानता है, तो मैनेजर के दिमाग में सस्ते, जल्दी निपटने वाले जुगाड़ ही घूमने लगते हैं।
मैनेजर एक सीधी बात पकड़ता है। मेले में कुल खरीदारी, टोकन कितने हैं और हर टोकन कितनी बार हाथ बदलता है, दोनों से बनती है। कुछ लोग टोकन जेब में दबाए रखते हैं या यादगार के लिए रख लेते हैं, तो टोकन धीमे चलते हैं और ज़्यादा टोकन चाहिए।
फिर एक और बात दिखती है। एक दुकान पर खर्च होता है, तो वही टोकन मज़दूरी बनकर, फिर खाना बनकर, फिर सामान खरीदकर आगे बढ़ते हैं। मतलब लोग कितने टोकन पकड़े रहना चाहते हैं, यह सिर्फ एक ठेले की कमाई नहीं, पूरे मेले की चलती-फिरती रफ्तार पर टिका है। यही सीख है।
अब सवाल बदल जाता है। नए टोकन छापकर सुधार करना ठीक तब है जब उससे मेला इतना भरोसेमंद और आरामदेह बने कि लोग और दुकानदार आगे चलकर ज़्यादा टोकन रखना और चलाना चाहें। मैनेजर नियम भी जोड़ता है, कूड़ा बढ़ाने वाली चीजों पर छोटा सा टोकन शुल्क, और रीफिल स्टेशन पर टोकन छूट।
मैनेजर देखता है कि मेला दो तरह से टिक सकता है। एक में कुछ लोग चुटकी भर फायदे के लिए सबका भरोसा तोड़ देते हैं। दूसरे में मरम्मत समय पर होती है और दाम ठीक रहते हैं, पर उसे संभालना पड़ता है। वह दिन में छोटे लेन-देन से कमी-बेसी शांत करता है, और मौसम के हिसाब से सामान की खरीद-बिक्री से खर्च को स्थिर रखता है।
समापन के दिन टोकन उसे बोझ नहीं लगते। वे एक वादा लगते हैं, ऐसे मेले का वादा जिसमें जनरेटर, रोशनी, साफ शौचालय, सामान और प्रशिक्षित लोग सच में मौजूद हों। फर्क बस इतना है कि अब वह भविष्य को छोटा करके नहीं देखता; वह मेले की लंबी दौड़ वाली सेहत को असली हिसाब मानता है।