एक ही पर्ची से हर काम: छोटे से अभिलेखागार की बड़ी तरकीब
बारिश खिड़की पर टक-टक कर रही थी। मोहल्ले के छोटे अभिलेखागार में मैं लैम्प के नीचे पर्चियाँ काट रहा था। कोई लंबी चिट्ठी का छोटा सार चाहता, कोई उलझे पैरे से बस एक नाम। मैं हर बार पर्ची के ऊपर एक छोटा-सा शब्द लिखता, फिर वही लिखावट आगे बढ़ती।
पहले यहाँ अलग-अलग काउंटर थे। हाँ-ना वाले सवाल अलग, जवाब अलग, सार अलग, अनुवाद अलग। हर काउंटर के नियम अलग थे, तो तुलना भी बेकार हो जाती। एक काउंटर ठीक लगे तो समझ नहीं आता, सच में काम बेहतर हुआ या बस तरीका बदल गया।
फिर एक नई आदत बनी। हर काम को एक ही ढाँचे में लाना: लिखावट अंदर, लिखावट बाहर। पर्ची पर ऊपर साफ लिखा होता, सार लिखो, अनुवाद करो, जवाब दो, या लेबल लगाओ। जवाब भी हमेशा शब्दों में होता, चाहे बस "हाँ" ही क्यों न हो। मतलब एक ही मेज, एक ही रूटीन, कई काम।
अभ्यास के लिए हम फटे पन्नों से खेलते। एक पन्ने की नकल बनती, फिर कुछ हिस्सों पर हटने वाली पट्टियाँ लगतीं, हर पट्टी पर अपना निशान। मुझे पूरा पन्ना नहीं लिखना होता था, बस छिपे हिस्से, उसी क्रम में, उन्हीं निशानों के बीच। पास-पास के शब्द एक साथ छिपें तो काम तेज भी होता, और सीख भी साफ बैठती।
अब नियम एक जैसे थे, तो तुलना सच में हो पाई। सबसे अच्छा नतीजा तब आया जब काम दो हिस्सों में बँटा: एक व्यक्ति पर्ची और लिखावट ध्यान से पढ़कर जमाए, दूसरा जवाब लिखे। अगर एक ही व्यक्ति सब कुछ करे, या ठीक से पढ़े बिना लिखने लगे, तो अलग-अलग कामों में चूक बढ़ जाती।
फिर असली सेवा की बारी आई। हम या तो हर तरह की पर्चियाँ एक साथ घुमा सकते थे, या पहले वही छिपे-हिस्सों वाला अभ्यास खूब करें, फिर किसी एक नए काम पर थोड़ी देर खास ट्रेनिंग दें। सब कुछ मिलाकर करना आसान लगता, पर संतुलन बिगड़े तो कुछ हुनर दब जाते। अलग से छोटा परिचय मिलते ही मैं नई तरह की पर्ची पर भी जल्दी ढल जाता।
आखिर में साफ दिखा कि समय, मेहनत, और कभी-कभी दो-तीन लोगों की राय जोड़ना, लंबे सार जैसे कामों में मदद करता है। असली फायदा आम लोगों के लिए बस इतना है: हर काम के लिए अलग मशीन नहीं, एक मजबूत पढ़ो-और-लिखो रूटीन। लेकिन अगर शेल्फ़ में ज़्यादातर एक ही भाषा हो, तो कई भाषाओं वाले कामों में वह उतना तेज नहीं बन पाता।