जब सब एक साथ बोलें, तो बात कैसे बचे?
समुद्र किनारे के कस्बे के सभागार में तूफान की तैयारी का अभ्यास शुरू होने वाला था। दर्जनों लोग एक ही चैनल पर रेडियो उठाकर बोल पड़े, आवाजें गड्डमड्ड। समन्वयक ने दीवार पर नक्शा चिपकाया और बोला, "बात काम की रहे, शोर नहीं।"
समन्वयक ने पिछली गलती याद दिलाई। हर आदमी हर आदमी को सीधे बुलाने लगा था, तो लाइनें उलझ गईं। लंबी खबरें कट गईं, दूर की जरूरी बात सही कान तक नहीं पहुंची। कुछ लिखाई पढ़ने वाली मशीनों में भी यही होता है, जब हर शब्द हर शब्द से एक साथ पूछताछ करे।
इस बार योजना अलग थी, ठीक BIGBIRD वाली तरकीब जैसी। बीच में कुछ डिस्पैचर बैठे, जो सबकी बात सुन सकें, और जरूरत पर सब उनसे जुड़ सकें। बाकी लोग अपने इलाके में ही ज्यादा बात करें, पास की खबर पास ही रहे। फिर हर थोड़ी देर में एक इलाका दूर के किसी इलाके को अचानक पुकारे, ताकि खबर उछलकर आगे बढ़े।
अभ्यास चला। नदी किनारे वाला स्वयंसेवक अपने इलाके के मुखिया को बोला, मुखिया ने डिस्पैचर तक पहुंचाया। डिस्पैचर ने शहर पार वाले शरण-स्थल को छोटा सा सार भेजा, उधर से सड़क बंद होने की बात लौट आई। डिस्पैचर बार-बार जरूरी बात समेटकर आगे फेंकते रहे, और दूर-दूर के हिस्से कटे नहीं रहे।
फिर किसी ने पूछा, "अगर हर इलाके को तुरंत हर दूसरे इलाके से तुलना करनी हो तो?" समन्वयक ने सिर हिलाया। तब यह हल्की-फुल्की जाल वाली योजना धीमी पड़ सकती है, क्योंकि कई तुलना को बीच के चक्करों से होकर जाना पड़ता है।
फायदा फिर भी साफ था। वही रेडियो, वही समय, पर भीड़ बड़ी हो गई तो भी काम चल गया, क्योंकि ज्यादातर बातें पास-पास रहीं और कुछ ही लोग सबको जोड़ते रहे। BIGBIRD भी यही चाहता है, लंबी लिखाई या डीएनए जैसी लंबी लड़ी में मतलब दूर तक पहुंचे, बिना हर जगह सीधी लाइन खींचे।