भीड़ में चेहरा खोजते हुए मशीन ने क्या सीखा
आगमन द्वार फिर सरक कर खुला। सामने ट्रॉली बैगों की कतार, अलग-अलग कोट, जल्दी-जल्दी चलते लोग। कोई एक चेहरा मन में पकड़े खड़ा है, लेकिन इंतजार का रंग इस बात से बदल रहा है कि उसकी नजर हर पल कितनी टिकी रहती है।
यहीं से नई बात शुरू होती है। कई लोग मशीन में भावना के लिए अलग खांचा बनाना चाहते थे, जैसे भीतर कोई छिपा हुआ पर्चा रखा हो। लेकिन भीड़ बदलते ही खोज क्यों घबरा जाती है, गलत चेहरों पर क्यों अटकती है, या फिर शांत क्यों पड़ती है, यह उससे नहीं समझ आता।
नई चाल अलग है। बेचैनी दिखाने के लिए मशीन में कोई नया डिब्बा नहीं जोड़ा गया। उसकी याद में जितनी ज्यादा खड़खड़ाहट होगी, वह उतनी जल्दी हर नए चेहरे, आवाज और दरवाजे की तरफ झटके से मुड़ेगी। खड़खड़ाहट कम हो तो वही चाहा गया चेहरा देर तक टिका रहता है।
और जो हल्की-सी अच्छी लगने वाली तरफ है, वह इनाम से उठती है। बाहर से मिलने वाले इनाम से भी, और उस छोटे उछाल से भी जब कोई नया मेल अचानक बैठ जाए। चाल, दुपट्टा और बैग का आकार एक साथ जमे, तो खोज फिर से सार्थक लगती है। बात सीधी है: भावना चलती खोज से उगती है, अलग छिपे खाने से नहीं।
यह बात तब और साफ होती है जब मशीन अकेली नहीं रहती, किसी इंसान के साथ जुड़ती है। अगर शरीर के संकेत बताएं कि सामने वाला उलझ रहा है, तो मशीन अपनी यही खड़खड़ाहट या इनाम की पकड़ हल्के से बदल सकती है, जैसे बगल में खड़ा साथी गलत दरवाजे से नजर हटवा दे। कभी मदद सामने वाले जैसी बनकर नहीं, उलटी दिशा में टिकाव देकर मिलती है.
तो नई चीज मशीन के भीतर भावना नाम की नई पेटी नहीं है। नई चीज यह है कि ध्यान और सीखने वाली वही पुरानी गांठें, सही जोड़-घटाव से भाव जैसी चाल दिखाने लगती हैं, खासकर जब सामने कोई जीवित इंसान हो। तब बदलाव का कारण दिखता है। काला डिब्बा थोड़ा खुल जाता है।