वो कहता है, ब्रह्मांड की रिकॉर्डिंग में भी ऐसा ही है। आसमान में गरम-ठंडे धब्बों वाला तेज पैटर्न तो पहले से साफ था। मुश्किल उस बहुत हल्के पैटर्न की थी जो शुरुआती ब्रह्मांड से जुड़ा है, और औज़ार की आदतें उसे गड़बड़ा देती थीं। उसी से पता चलता है कि पहले तारों के बाद कब ब्रह्मांड फिर से साफ और पारदर्शी हुआ।
नई बात ये नहीं कि कोई नया दूरबीन आया। वही पूरा डेटा लेकर उसे ज्यादा सावधानी से साफ किया गया और बार-बार मिलान किया गया। कमजोर संकेत को ठीक करने के लिए कई यथार्थ जैसे नकली आसमान बनाकर जाँचा गया, ताकि सुधार अंदाज़े से न हो। दो दिक्कतें खास पकड़ी गईं: तेज पैटर्न का रिसाव, और कमजोर चैनल की कुल संवेदनशीलता का हल्का सा गलत सेट होना।
तकनीशियन एक तरकीब दिखाता है। पहले नापो कि धुन का कितना हिस्सा फुसफुसाहट वाले चैनल में रिस रहा है, फिर पहचान वाली जांच-ध्वनि से उसे घटा दो, और दोबारा चला कर पक्का करो। फिर फुसफुसाहट वाले चैनल की असली संवेदनशीलता सेट करो, ताकि धीमी आवाज को शोर या चुप्पी न समझो। यही सफाई उस ब्रह्मांड वाली घड़ी को भरोसेमंद बनाती है।
अब फुसफुसाहट स्थिर हुई तो अनुमान कस गए। वो समय-निशान ज्यादा ठीक बैठा, और उससे जुड़े दूसरे अंदाज़े भी साफ हुए, जैसे आज पदार्थ कितना गुच्छों में जमा है और कुल पदार्थ कितना है। नतीजों को अलग-अलग तरह से मिलाकर भी देखा गया: सिर्फ तेज पैटर्न से, सिर्फ हल्के पैटर्न से, दोनों साथ, और रास्ते में पदार्थ के कारण पड़ने वाली हल्की टेढ़ से।
तकनीशियन कमरे की तरफ कान करता है। रिकॉर्ड में गायक के साथ हॉल की हल्की गूंज भी छपी रहती है, और वो भी सुराग देती है। वैसे ही रास्ते में पड़ा पदार्थ उस ब्रह्मांड वाली रोशनी को थोड़ा मोड़ता है, और उसका निशान कुछ उलझनें खोल देता है। बाहर के दूरी-मापों के साथ जोड़ने पर ब्रह्मांड बहुत हद तक समतल दिखता है, और न्यूट्रिनो के कुल द्रव्यमान की गुंजाइश और सिमटती है।
सत्र के आखिर में दोनों प्लेयर एक ही धुन पर सहमत हैं। सबसे सरल, कम-घुंडी वाला ब्रह्मांड-वाला हिसाब अब भी रिकॉर्डिंग से अच्छी तरह मेल खाता है, और अतिरिक्त जोड़ अक्सर बेकार लगते हैं। मेज पर दो ढीले धागे फिर भी पड़े हैं: कहीं थोड़ा ज्यादा धुंधलापन चाहने का इशारा, और फैलाव की रफ्तार का वो फर्क जो कुछ नज़दीकी मापों से नहीं मिलता। तकनीशियन सुई उठाता है, इस बार जीत शोर की नहीं, साफ फुसफुसाहट की है।