बारिश में अधूरा बस-नक्शा, और शरीर के अंदर का दूसरा नक्शा
बारिश में बस झटके से रुकी। मेरे सामने रास्ते का नक्शा था, पर कई गलियाँ धुंधली थीं और कुछ इलाक़े गायब। शहर पार करना था, पर गलत अंदाज़ा लगाया तो गलत स्टॉप। लोगों के डीएनए की तुलना भी ऐसे ही नक्शे पर टिकी रहती है।
लंबे समय तक जो साझा डीएनए-नक्शा चलता रहा, वह कुछ लोगों के लिए साफ़ था और कुछ के लिए कमज़ोर। वह ज़्यादातर छोटे बदलाव दिखाता था, पर बड़े बदलाव भी होते हैं, जैसे हिस्से कट जाना या जगह बदलना। नक्शे में पुल छूट जाएँ तो भटकना तय है।
फिर कई देशों के लोगों ने मिलकर ज़्यादा पूरा नक्शा बनाया। उन्होंने अलग-अलग इलाक़ों के लोगों के डीएनए को देखा और एक ही तरह की पढ़ाई पर नहीं टिके। जैसे हर सड़क पर जल्दी से बस घुमाना, भीड़ वाले हिस्सों में पैदल देखना, और जगह-जगह लगे पक्के बोर्ड से सब मिलाना।
नया काम सिर्फ़ ज्यादा लोग जोड़ना नहीं था। उन्होंने पहले दूर-दूर तक चलने वाले मुख्य रास्ते और बदलने के ठिकाने जमाए, ताकि लंबी दूरी की रेखाएँ टेढ़ी न हों। फिर आसान मोड़ जोड़े। सबसे मुश्किल बदलाव, जैसे बड़े कटाव या उलट-पुलट, बाद में एक-एक करके रखे।
उन्होंने एक औज़ार पर भरोसा नहीं किया। कई तरह से पढ़कर जो बातें सबसे भरोसेमंद लगीं, वही रखीं, और कुछ मुश्किल बड़े बदलावों को अलग तरीक़े से फिर टटोला। नतीजा ऐसा नक्शा बना जिसमें फर्क सिर्फ़ गिनती बनकर नहीं पड़े थे, यह भी दिखता था कि कौन-सी सड़क किस सफ़र की कड़ी है।
इस नक्शे से एक आम तस्वीर उभरती है। ज़्यादातर फर्क छोटे होते हैं, पर जो बड़े बदलाव होते हैं वे बहुत बड़े हिस्से को छू लेते हैं। अफ्रीकी मूल वाले लोगों में कुल फर्क अक्सर ज़्यादा दिखते हैं। कई दुर्लभ गलियाँ बस एक इलाके में मिलती हैं, पर मुख्य सड़कें सबमें चलती हैं।
फायदा तब दिखता है जब किसी के डीएनए में सब कुछ साफ़ नहीं पढ़ा गया हो। बेहतर नक्शे से खाली जगहें भरना आसान होता है, और अलग-अलग इलाक़ों के लोगों पर भी अंदाज़ा कम चूकता है। बस में बैठे-बैठे मुझे लगा, अब गायब पुल वाला रास्ता भी दिख रहा है, तो उतरने का फैसला तुक्का नहीं रहता।