वो लाइब्रेरियन जिसे फ़ोन, कैलकुलेटर और फ़ीडबैक ने बदल दिया
एक छोटे शहर की लाइब्रेरी में एक लाइब्रेरियन बैठी है। हर सवाल का जवाब देती है, लेकिन कुछ किताबें पुरानी हैं, कुछ अलमारियों पर गलत लेबल लगे हैं। कभी-कभी वो पूरे भरोसे से ऐसे लेखक का नाम बता देती है जो कभी था ही नहीं। ये लाइब्रेरियन असल में वो चैटबॉट है जिससे हम रोज़ बात करते हैं, बहुत कुछ जानती है, लेकिन कुछ कमज़ोरियाँ हैं।
बोर्ड ने उसे हटाया नहीं, बल्कि उसकी मेज़ पर एक फ़ोन लगा दिया। अब जब कोई ताज़ा खबर पूछता है, वो शहर के दूसरे छोर पर मौजूद अपडेटेड संग्रह को फ़ोन करती है, ताज़ा जानकारी लेती है, और फिर जवाब देती है। बात करना अब भी उसका काम है, लेकिन बोलने से पहले वो जाँच लेती है। गलत जवाब काफ़ी कम हो गए।
हिसाब-किताब में अब भी गड़बड़ होती थी। तो बोर्ड ने उसकी मेज़ पर एक कैलकुलेटर रख दिया और एक साफ़ नियम बनाया, जब भी गिनती का सवाल आए, पहले कागज़ पर लिखो, फिर कैलकुलेटर में डालो, फिर जवाब दो। अब वो अंदाज़े से नहीं बोलती। सवाल वो समझती है, गणित मशीन करती है।
एक दिन किसी ने पूछा कि पिछले कुछ सालों में किस लेखक की ज़्यादा किताबें आईं। लाइब्रेरियन ने पहले फ़ोन किया, दोनों लेखकों की सूची माँगी। फिर कैलकुलेटर से गिनती की। एक कमी दिखी तो दोबारा फ़ोन किया। सोचो, करो, जाँचो, फिर सोचो। यही चक्र है जो जवाब को भरोसेमंद बनाता है।
फ़ोन, कैलकुलेटर, सोचने का चक्र, सब एक साथ सँभालना मुश्किल हो रहा था। तो बोर्ड ने एक सहायक रखा जिसके पास एक क्लिपबोर्ड है। उसमें लिखा है कि किस तरह के सवाल पर कौन-सा औज़ार इस्तेमाल करना है, पुरानी बातचीत कैसे याद रखनी है। अब लाइब्रेरियन को हर बार नए सिरे से सोचने की ज़रूरत नहीं।
लेकिन फिर बजट की समस्या आई। किताबों से भरा पूरा हिस्सा बहुत जगह खा रहा था। इंजीनियरों ने पाया कि हर मोटी किताब को एक पतली पर्ची में बदला जा सकता है, बस तीन निशानों से, हाँ, ना, या छोड़ो। जगह कई गुना कम लगी, ऊर्जा बची, और जवाबों की गुणवत्ता में लोगों को फ़र्क़ मुश्किल से दिखा।
कुछ लोग चाहते थे कि लाइब्रेरियन स्थानीय इतिहास में माहिर हो जाए, बाकी सब भूले बिना। तो उसकी हर नोटबुक में एक पतला कार्ड डाल दिया गया। कार्ड में सिर्फ़ वो बदलाव हैं जो इतिहास के सवालों के लिए चाहिए। पुरानी नोट्स जस की तस। कल कोई और विषय चाहिए तो नया कार्ड लगाओ, पुराना निकालो।
आख़िरी बदलाव सबसे नाज़ुक था। लोगों ने जवाबों को रेटिंग देनी शुरू की। एक मार्गदर्शक ने इन रेटिंग्स से एक पैमाना बनाया। लाइब्रेरियन अब कई जवाब तैयार करती, पैमाने से छानती, और सबसे अच्छे से सीखती। बात ये है कि उसे कभी बदला नहीं गया। बस सही औज़ार दिए गए। आज जो चैटबॉट हम इस्तेमाल करते हैं, वो एक अकेली प्रतिभा नहीं, बल्कि सहारों से घिरी एक अच्छी बातचीत करने वाली है।