रिहर्सल से पहले, मंच पर एक अजीब सी दौड़
थिएटर में ड्रेस रिहर्सल शुरू होने से ठीक पहले मैं मंच के किनारे खड़ा था। लोग इधर-उधर भाग रहे थे, और एक लड़का तेज़ी से बोल रहा था, “ये कुर्सी, ये लालटेन, ये परदा।” चीज़ दिखना काफी नहीं था। उसकी सही घेर-रेखा और नाम तुरंत चाहिए था।
दो दिक्कतें रोज़ की थीं। धीरे बोले तो अगला संकेत छूट जाता। तेज़ बोले तो छोटी चीज़ों पर गड़बड़ हो जाती, चाबी का छल्ला या पतला दुपट्टा। और जो घेर-रेखा वह मन में बनाता, वह थोड़ा सरक जाती।
फिर हमने छोटे-छोटे बदलाव किए। सब एक ही आसान रिहर्सल क्रम मानते, ताकि किसी की चाल बेतरतीब न हो। जल्दी दौड़ से पहले पूरा मंच नाप लेते। टेप से कई तैयार “घेर” रखे, एक नहीं। पुराने सामान देखकर वही कुछ आकार चुने जो ज़्यादातर पर ठीक बैठते।
कॉल करने का नियम भी बदला। मंच की जाली के हर खाने में चीज़ रखी जा सकती थी, पर बाहर नहीं, तो कोई इशारा बेकार जगह पर नहीं जाता। और छोटी चीज़ें न खो जाएँ, इसके लिए पास खड़ा सहायक फुसफुसाकर बारीक बातें बताता, फिर मुख्य आदमी तुरंत फैसला करता।
अगला झटका अच्छा था। भारी औज़ारों की ट्रॉली हट गई; कम सामान, पर ठीक जगह रखा हुआ। काम वही, रुकावट कम। जैसे किसी कैमरे की “आँख” को हल्का कर दो, ताकि वह जल्दी-जल्दी देखे और फिर साफ़ सार आगे भेज दे।
फिर सूची बढ़ी, जैसे सामान की किताब एकदम फैल गई हो। हर चीज़ की एक-एकदम सही पहचान हमेशा नहीं चाहिए थी। अगर “कौन सी लालटेन” समझ न आए, तो “लालटेन” बोल देना भी सुरक्षित था। नामों को परिवार की तरह बाँटा गया, पास-पास वाले नामों में कदम-दर-कदम चुनते गए।
रिहर्सल में दो तरह का अभ्यास चलता रहा। कुछ दृश्यों में सामान की जगहें साफ़ चिन्हित थीं, तो घेर-रेखा सधी। कुछ में बस तस्वीर और नाम था, जगह नहीं; तब जो चीज़ सबसे ठीक लगती, उसी पर नाम टाँक देते, जितनी जानकारी नाम देता उतनी ही। सीख ये थी कि टेप के घेर, जाली की सीमा, और पास वाला सहायक मिलकर तेज़ी और सटीकता दोनों बढ़ाते हैं।
शो के दिन वही टीम कभी तेज़ चलती, कभी थोड़ा धीमा होकर ज़्यादा साफ़ बताती, बस नज़र का फैलाव बदलकर। जानवरों वाले सामान पर वे कमाल थे, क्योंकि वैसा अभ्यास ज्यादा था; कुछ कपड़ों या औज़ारों पर अटकते। कोई जादू नहीं था। बस घेर-रेखा के कई अंदाज़े, जगह की लगाम, और नाम सीखने का नया तरीका।