जंगल की पाठशाला: सही और गलत का साथ
एक घने जंगल में एक नया छात्र एक बहुत कीमती मशरूम ढूँढ रहा है। उसके पास जो गाइडबुक है, उसमें सिर्फ एकदम सही और स्वस्थ मशरूम की तस्वीरें हैं। उसे लगता है कि असली दुनिया में भी उसे बस उन तस्वीरों जैसी बेदाग चीजें ही खोजनी हैं।
उसे एक फंगस मिलता है जो लगभग सही दिखता है, बस उसके तने का रंग थोड़ा फीका है। चूंकि उसने अपनी ट्रेनिंग में सिर्फ 'परफेक्ट' नमूने देखे हैं, वह इस थोड़े अलग दिखने वाले मशरूम को बेकार समझकर वहां से हटाने ही वाला है।
तभी उसका गाइड उसे रोकता है। वह सही मशरूम की तरफ इशारा करने के बजाय, उस जहरीले हमशक्ल को उठाता है और उसे कीमती मशरूम के ठीक बगल में रख देता है। अब असली और नकली दोनों एक साथ रखे हैं।
गाइड उस पर 'गलत' का टैग लगा देते हैं। अब जब दोनों आमने-सामने हैं, तो छात्र को साफ दिखता है कि असली और नकली के तने की बनावट में बारीक फर्क क्या है। यह तुलना उसे वह किताब कभी नहीं सिखा पाई थी।
क्या 'नहीं' चुनना है, यह देखने से सही चीज की पहचान पक्की हो जाती है। सिर्फ सही उदाहरण देखने के मुकाबले, गलतियों को सामने रखकर तुलना करने से नियम बहुत जल्दी और गहराई से समझ में आते हैं।
अब वह जंगल में नए भरोसे के साथ आगे बढ़ता है। जो चीजें पहले उसे उलझन या बेकार कचरा लगती थीं, अब वही उसे सही रास्ता दिखाने वाले जरूरी संकेत बन गई हैं।