रेडियो का शोर और ब्लैक होल का राज़
कल्पना करो कि तुम रात में एक पुराने रेडियो स्टेशन के बूथ में खड़े हो। ट्रांसमीटर चालू है, लेकिन स्पीकर से बस 'शूँ-शूँ' की खाली आवाज़ आ रही है। तुम माइक में कुछ भी बोलो, ऐसा लगता है कि तुम्हारी आवाज़ एक अंधे कुएं में जा रही है और वापस बस वही लगातार, बेमतलब का शोर आ रहा है।
बरसों तक वैज्ञानिक मानते थे कि ब्लैक होल बिल्कुल इसी खराब रेडियो जैसे हैं। माना जाता था कि अगर तुम उसमें कोई किताब या राज़ फेंक दो, तो वह हमेशा के लिए गायब हो जाता है। ब्लैक होल बस अपनी ही गर्मी की धुन बजाता रहता था, जिसका तुम्हारे फेंके हुए सामान से कोई लेना-देना नहीं था।
लेकिन नई समझ ने इस मशीन का स्विच ऑन कर दिया है। पता चला कि यह ट्रांसमीटर सुस्त नहीं है। जब कोई जानकारी या सिग्नल इसकी सीमा पर पहुंचता है, तो वह चुपचाप डूबता नहीं है। वह वहां मौजूद ऊर्जा के मैदान को एक 'धक्का' देता है, जिससे सिस्टम को तुरंत जवाब देना पड़ता है।
यह धक्का एक एम्पलीफायर या लाउडस्पीकर जैसा काम करता है। सिग्नल को निगलने के बजाय, ब्लैक होल उसकी एक धुंधली नकल तैयार करता है और उसे बाहर फेंक देता है। यानी जो संदेश अंदर जा रहा था, वह बाहर आने वाले शोर में अपनी ही एक कॉपी बना लेता है।
इसका मतलब है कि वह 'शूँ-शूँ' की आवाज़ बेकार शोर नहीं है, बल्कि हर उस चीज़ की उलझी हुई रिकॉर्डिंग है जो कभी अंदर गई थी। अगर तुम्हारे पास सही रिसीवर हो जो शोर को छान सके, तो तुम उस टेप को फिर से बजा सकते हो और अपना खोया हुआ संदेश वापस सुन सकते हो।