विशाल पेंटिंग और छोटा फ्रेम
एक कलाकार पुरानी हवेली की छत पर बनी विशाल पेंटिंग को ठीक कर रही थी। तस्वीर इतनी बड़ी थी कि एक साथ उस पर काम करना मुमकिन नहीं था। उसने काम आसान करने के लिए लकड़ी का एक छोटा चौकोर फ्रेम बनाया और उसे दीवार पर लगा दिया, ताकि उसका ध्यान सिर्फ उस छोटे से हिस्से पर रहे।
वह फ्रेम के अंदर तेजी से रंग भरने लगी, लेकिन जब उसने फ्रेम को अगली जगह सरकाया, तो एक दिक्कत आई। अलग-अलग टुकड़ों में काम करने से किनारे आपस में मिल नहीं रहे थे। पेड़ की डाल दूसरे हिस्से के तने से कट गई थी, जिससे पेंटिंग बिखरी हुई टाइल्स जैसी लग रही थी।
उसने एक तरकीब निकाली। अगली बार उसने फ्रेम को पूरा नहीं, बल्कि सिर्फ आधा खिसकाया। अब फ्रेम ठीक उस जगह पर था जहाँ दो पुराने हिस्से मिलते थे। इस 'खिसकती खिड़की' से वह टूटे हुए किनारों को एक साथ देख पाई और लकीरों को आपस में पक्का जोड़ दिया।
इस तरह फ्रेम खिसकाते हुए, छोटे-छोटे सुधार बड़े हिस्सों में बदलने लगे। अब वह सिर्फ लकीरें नहीं सुधार रही थी, बल्कि आकृतियाँ बना रही थी। पत्तियां जुड़कर टहनियाँ बन गईं और टहनियाँ पेड़ का रूप लेने लगीं। समझ का दायरा अब बड़ा हो गया था।
जब उसने नीचे उतरकर देखा, तो छत टुकड़ों में नहीं, बल्कि एक शानदार तस्वीर जैसी चमक रही थी। एक जगह टिकने के बजाय नजरिए को थोड़ा-थोड़ा बदलते रहने से, उसने पूरी विशाल पेंटिंग को बिना एक साथ देखे ही मुकम्मल कर दिया था।