एक नजर में भीड़ समझने वाली नजर
स्टेशन के बाहर भीड़ बह रही थी। गार्ड दीवार भर की स्क्रीन देख रहा था, लोग और बैग एक साथ हिलते जा रहे थे। आज गार्ड ने तय किया कि रुककर कोना-कोना नहीं देखेगा, बस पूरी स्क्रीन पर एक नजर डालकर वहीं निशान लगाएगा जहां लोग और बैग हैं।
पहले वाली तरकीब गार्ड की पुरानी आदत जैसी थी। स्क्रीन के छोटे-छोटे हिस्से बार-बार देखना, फिर हर हिस्से पर अलग से पक्का करना। बात ये है कि भीड़ चलती रहे तो इतनी बार रोकना और टटोलना समय खा जाता है।
नई चाल में स्क्रीन को एक ही बार में देखा जाता है और उसी पल दो बातें निकलती हैं, चीज कहां है और चीज है क्या। अलग-अलग पड़ाव नहीं, एक ही बहाव। गार्ड भी वैसे ही करता है, पूरी तस्वीर लेकर तुरंत लोगों और बैग के चारों तरफ डिब्बे जैसा निशान बना देता है।
गार्ड मन में स्क्रीन को कुछ हिस्सों में बांट लेता है। जिस हिस्से में किसी का बीच वाला भाग आता है, वही हिस्सा जिम्मा लेता है। हर हिस्से में गार्ड दो-चार चौखटे सोचता है, फिर जो सबसे ठीक बैठे उसे चुनकर उसके पास नाम भी लिख देता है, आदमी या बैग जैसा। यही बंटवारा और भरोसे का अंदाजा काम संभालता है।
गार्ड को ये भी समझ आया कि खाली फर्श पर बहस करने से अच्छा है दिख रहे इंसान की हद ठीक बनाना। बड़े आकार की गलती छोटी चीजों पर भारी न पड़े, इसलिए नजर को बराबरी से टोकना पड़ता है। और अगर दो कलम हों, तो जो कलम जिस तरह का चौखटा ठीक बनाती है, उसे वही काम बार-बार करने देना आसान पड़ता है।
इस एक-नजर वाली चाल से गार्ड तेज हो गया। पूरी स्क्रीन का संदर्भ मिलने से गार्ड छाया को इंसान समझकर घेरने में कम फिसलता है। लेकिन जब लोग सटकर चलते हैं, तो जल्दी में बने चौखटे कभी-कभी टेढ़े हो जाते हैं और गलत आदमी पर चढ़ जाते हैं।
फिर ड्यूटी में एक दूसरा गार्ड भी था जो धीरे-धीरे पास से देखकर पक्का करता था। तेज वाला गार्ड पहले निशान लगा देता, धीमा वाला गार्ड जांच लेता। जब दोनों के चौखटे एक जगह मिलते, भरोसा बढ़ जाता; जब अलग होते, टीम समझ जाती कि गलती किस तरह की हो सकती है। तब गार्ड को लगा, एक नजर वाली चाल ने भीड़ के साथ कदम मिला लिया।